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________________ अध्याय : पाठवां ] निवृतिमुपठौकन्ते" प्राचार्य यति वृषभ के उपदेशानुसार क्षीणकषाय गुणस्थान के चरम समय में सम्पूर्ण अघातिया कमों की स्थिति में समानता का अभाव होने से सभी केवली समुद्धात पूर्वक ही मोक्ष प्राप्त करते हैं । आगे यह भी कथन किया गया है "येषामाचार्याणां लोकव्यापि-केवलिधु विशति-संख्या नियमस्तेषां मतेश कविसमुयातन्ति, चिन्न समुद्घातथान्त । के न समुद्घातयन्ति ? येषां संसृतिव्यक्तिः कर्मस्थित्याः समाना, ते न समुद्धातयन्ति, शेषाः समुद्धातयन्ति" (पृ० ३०२ भाग १) जिन प्राचार्यों ने लोक पूररण समुद्घात करने वाले केवलियों की संख्या नियम रूप से बीस मानी है, उनके अभिप्रायानुसार कोई जीव समुद्घात करते हैं, और कोई समुद्धात नहीं करते हैं । कौन प्रात्माएं समुद्धात नहीं करती हैं ? जिनकी संमृत्ति की व्यक्ति अर्थात् संसार में रहने का काल जिसे आयु कर्म के नाम से कहते हैं, अर्थात् जिनका नाम, गोत्र तथा वेदनीय कर्मों की स्थिति आयु कर्म की स्थिति के समान हैं, वे केवली समुद्घात नहीं करते हैं, शेष केवली समुद्घात करते हैं। सिद्ध परमात्मा समुच्छिन्न-क्रिया-निर्वात अथवा व्युपरत क्रिया-निवृत्ति ध्यान के होने पर प्रारणापान अर्थात् श्वासोच्छ्वास का गमनामन कार्य रुक जाता है । समस्त कार्य, अचन तथा मनोयोग के निमित्त से सम्पूर्ण आत्मा प्रदेशों का परिस्पन्दन बन्द हो जाता है । उस ध्यान के होने पर परिपूर्ण संवर होता है । उस समय १८ हजार शील के भेदों का पूर्ण स्वामित्व प्राप्त हो जाता है । ८४ लाख उत्तर गुणों की पूर्णता प्राप्त होती है । सम्यग्दर्शन का श्रेष्ठ परमावगाढ़ सम्यक्त्व तो तेरहवें मुरणस्थान में प्राप्त हो गया था । ज्ञानावरमा का क्षय होने से सम्यग्ज्ञान की भी पूर्णता हो चुकी थी, फिर किंचित् न्यून एक कोटि पूर्व वर्ष प्रमाण तक निर्माण अवस्था की उपलब्धि न होने का कारण पूर्ण चरित्र में कुछ कमी है । अयोगी जिन होते ही वह तीन गुप्तियों का स्वामी हो जाता है। उस त्रिगुप्ति के प्रसाद से अयोगी जिन के उपांत्य समय में अर्थात् अंत के दो समयों में से प्रथम समय में साता-असाता वेदनीय में से अनुदय रूप एक वेदनीय की प्रकृति, देवगति, औदारिक, वैक्रियक, आहारक, लैजस, कामरिण ये पांच शरीर, पांच संघात, पांच बन्धन, तीन प्रांगोपांग, छह संहनत, छह संस्थान, पांच वर्ण, पांच रस, पाठ स्पर्श, दो गन्ध, देवगत्यानुपूयं, अगुरुलघु, उच्छवास, परघात,
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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