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________________ irani ७१२ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिंग भी यह योगी समा जाता है । इस कार्य के द्वारा सयोगी जिन अधातिया कर्मों की स्थिति में विषमता दूर करके उनको प्रायुकर्म के बराबर शीघ्र बनाते हैं । जिस प्रकार गीले वस्त्र को ऊंचा, नीना, आड़ा, तिरछा करके हिलाने से वह शीघ्र सूख जाता है, उसी प्रकार की इस क्रिया द्वारा योगी अधातिया कर्मों की स्थिति तथा अशुभ कर्मों की अनुभाग शक्ति का खंडन करते हैं । इस समुद्धात क्रिया के विषय में यह कल्पना करना अनुचित नहीं है कि समता भाव के स्वामी जिनेन्द्र देव सदा के लिये अपने घर सिद्धालय में जा रहे हैं, इससे वे सब जीवों से और विरोध छोड़कर बिना संकोच छोटे बड़े सबसे भेंट करते हुए तथा मिलते हुये मोक्ष जाने को तैयार हो रहे हैं । महापुराण में लिखा है-- तत्राघातिस्थिते र्भागान संख्येयानिहत्य सौ। अनुभागस्थ चानंतान् भागानशुभकर्मणाम् ।।१५५७॥ उस समय वे भगवान अधातिया कर्मों की स्थिति के असंख्यात भागों को बिनष्ट करते हैं। इसी प्रकार अशुभ कर्मों के अनुभाग के अनन्त भागों को नष्ट करते हैं। . इसके पश्चात अन्तर्मुहूर्त में योगरूपी प्रास्त्रब का विरोध करते हुये काय योग के आश्रय से वचनयोग तथा मनोयोग को सूक्ष्म करते हैं, और फिर काययोग को भी सूक्ष्म करके उसके आश्रय से होने वाले सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति नामक तीसरे शुक्ल ध्यान का चितवन करते हैं। . इस प्रसंग में यह बात ध्यान देने योग्य है कि क्षीणकषाय गुणास्थानवर्ती निर्ग्रन्थ ने एकत्व-वितर्क-अविचार रूप द्वितीय शुक्ल ध्यान के द्वारा केवलज्ञान की विभूति प्राप्त की थी। राजवातिककार ने केवली भगवान के लिये इन विशेषणों का प्रयोग किया है 'एकस्य-वितर्क शुक्ल ध्यान वैश्वानर-निर्दग्ध धातिकर्मेन्धनः, प्रज्वलित केवलज्ञान गभस्तिमंडलः' (रा० वा० पृ० ३५६) अर्थात् एकत्व वितर्क नामक शुक्ल ध्यान रूप अग्नि के द्वारा धातिया कर्म रूपी ईन्धन का नाश करने वाले तथा प्रज्वलित केवलज्ञान रूपी सूर्य से युक्त केवली भगवान हैं। ___ इस अवस्था बाली सभी प्रात्माएं समुद्घात करती हैं, ऐसा प्राचार्य यतिवृषभ का अभिप्राय' है । धवल टीका में लिखा है, “यति वृषभोपदेशात् सर्वधाति कर्मणां क्षीणकषाय चरम · समये स्थितेः ‘साम्याभावात् सर्वेऽपि कृतसमुद्धाताः सन्तो READ
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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