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अध्याय : आठयाँ ]
[ ७११ स्वात्मप्रदेश विसर्परगतश्चतुभिः समयैः कृत्वापुनरपि तावद्भिरेव समयः समुपहत. प्रदेशविसर्पणः समीकृत-स्थिति विशेष कर्मचतुष्टयः पूर्व-शरीर परिमारणो भूत्वा सूक्ष्मकाय योगेन सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानं ध्यायति (पृष्ठ ३५६ अध्याय ६ सूत्र ४४) ।
__ महापुराण में लिखा है--
सहि योगनिरोधार्थमुद्यतः केवली जिनः । .. समुद्घात-विधि पूर्वमाविष्कुर्यान्लिसर्गतः ॥१५५६॥
स्नातक केवली. जिन भगवान जब योगों का निरोध करने के लिये तत्पर होते हैं, तब वे उसके पूर्व ही स्वभाव से समुद्धात की विधि करते हैं। . .
समुद्घात विधि का स्पष्टीकरण इस प्रकार है- पहले समय में केवली के आत्म प्रदेश चौदह राजू ऊँचे दंड के प्रकार होते हैं। दूसरे समय में कपाट अर्थात् दरवाजे के किवाड़ आकार को धारण करते हैं । तृतीय समय में प्रतर रूप होते है । चौथे समय में समस्त लोक में व्याप्त हो जाते हैं। इस प्रकार वे जिनेन्द्र देव चार समय में समस्त लोकाकाश को व्याप्त कर स्थित होते हैं।
इस प्रसंग में यह बात ध्यान देने योग्य है कि ब्रह्मवादी ब्रह्मा को सम्पूर्ण जगत में व्याप्त मानते हैं । जैन दृष्टि से उनका कथन सयोगी जिन के लोक पूरणे समुद्घात काल में सत्यचरितार्थ होता है, क्योंकि लोक पूरण समुद्धात की अवस्था में जिनेन्द्र परमात्मा के आत्मप्रदेश समस्त लोक में विस्तार स्वभाववश व्याप्त होते हैं।
ब्रह्मबादी सदा बह्म को लोक व्यापी कहता है, इससे उसका कथन अयथार्थ हो जाता है।
लोकपूरण समुदधात् के अनन्तर आत्मप्रदेश पुनः प्रतररूपता को दूसरे समय में धारण करते हैं। तीसरे समय में कपाटरूप होते हैं तथा चौथे समय में दंडरूप । होते हैं और शरीराकार हो जाते हैं। इस समुद्घात् क्रिया के करने में विस्तार में चार समय तथा संकोच में चार समय अर्थात् समस्त पाठ समय लगते हैं। लोक· पुरण समुद्घात के समय प्रात्मा के प्रदेश सिद्धालय का स्पर्श करते हैं, नरक की भूमि
का भी स्पर्श करते हैं तथा उन आकाश प्रदेशों का भी स्पर्श करते हैं, जिनका पञ्च परावर्तन रूप संसार में परिभ्रमण करते समय इस जोव ने चौरासी लक्ष योनियों को धारण कर अपने शरीर की निवास भूमि बनाया था । अनन्तानन्त जीवों के भीतर