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[ गो. प्र. चिन्तामणि विशेष है कि प्रयोग केवली होने के पूर्व सयोगी जिन अधातिया कर्मों की स्थिति के असंख्यात भागों को नष्ट करते हैं तथा अशुभ कमों के अनुभाग को नष्ट करते हैं, उस समय उनके सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति शुक्ल ध्यान की योग्यता उत्पन्न होती है । . प्रश्न :- समुद्घातविधि क्या है ?
उत्तर :-समुद्घात विधि-हरिवंश पुराण में लिखा है 'जिस समय केवली की आयु अंतर्मुहूर्त मात्र रह जाती है और गोत्र जादि तीन अधातियां कर्मों की स्थिति भी आयु के बराबर रहती है, उस समय सूक्ष्म क्रिमा प्रतिपाति नाम का तीसरा शुक्ल ध्यान होता है और यह मन-वचन-काय की स्थूल क्रिया के माश होने पर उस समय होता है, जब स्वभाव से ही काय सम्बन्धी सूक्ष्म क्रिया का अवलंबन होता है।
अंतर्मुहूर्त शेषायुः स यदा भवतोश्वरः। . तत्त ल्यस्थितिमोत्रावित्रितयश्च लदा पुनः ॥१५५३॥
म वाडा मनोयोग काययोगं च बादरं । प्रहाप्यालख्य सूक्ष्मं तु काययोग स्वभावतः ॥१५५४॥ तृतीयं शुक्ल सामान्यात् प्रथमं तु विशेषतः । सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति ध्यानमाध्यातुमर्हति ।।१५५५।।
तत्वार्थ राजवासिक में अकलंक स्वामी ने लिखा है, जब सयोग केवली की आयु अंतर्मुहुर्त प्रमाण रहती है और शेष वेदनीय, नास तथा गोत्र इन कर्मों की स्थिति अधिक रहती है, उस समय प्रात्मोपयोग के अतिशय सहित साम्यभाव समन्वित विशेष परिणाम युक्त, संवर वाला, शीघ्र कर्मक्षय करने में समर्थ, योगी शेष कर्मरूपी रज के विनाश करने की शक्ति से अलंकृत स्वभाव से दंड, कपाट, प्रतर तथा लोकपूरण समुद्धात रूप आत्म प्रदेशों का चार समय में विस्तार करके पश्चात् उतने ही समयों में विस्तृत प्रात्म प्रदेशों को संकुचित करता हुआ चारों कर्मों की स्थिति विशेष को एक बराबर करके पूर्व शरीर बराबर परिमारण को धारण करके सूक्ष्म काय योग को धारण करता हुआ सूक्ष्मक्रिया प्रतिपाति नाम के धान को करता है । मूल ग्रन्थ के शब्द इस प्रकार हैं
· यदा पुनरंतर्मुहूर्त-शेषायुष्कस्ततोऽधित स्थिति विशेष कर्मश्रयो भवति योगी, तदात्मोपयोगातिशयस्य सामायिक सहायस्य विशिष्टकरणस्य महासंवरस्य लघुकर्मपरिपरिवाचनस्य ,शेषकर्म-रेणु-परिशातन शक्ति-स्वभाव्यात् दंड-कपाट:प्रतरलोकपूरणानि