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प्रध्याय : आठवां ]
[ ७०६ अधिक काल में केवली बनकर एक कोटि पूर्वकाल में से किचित् न्यून काल छोड़कर शेषकाल पर्यन्त केवली के कौनसा ध्यान रहता है ?
परमार्थ दृष्टि से 'एकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानं' यह ध्यान का लक्षण सर्वज्ञ भगवान में नहीं पाया जाता है। आत्म स्वरूप में प्रतिष्ठित होते हुए भी ज्ञानावर के क्षय होने से वे त्रिकालत भी हैं, पर उम्तो पास का कथन किस प्रकार सिद्ध होगा? चिन्ता का भी उनके अभाव है । 'चिन्ता अंतः करणवृत्तिः' अंतः करण अर्थात् क्षयोपशमात्मक भावमन की विशेषवृत्ति चिन्ता है । केवली के क्षायिक केवलज्ञान होने से क्षयोपशमरूप चित्तवृत्ति का सद्भाव भी नहीं है, तब उस चित्तवृत्ति का विरोध कैसे बनेगा ? इस अपेक्षा से केवली भगवान के ध्यान नहीं है। प्रश्न :-(इस पर शंका उत्पन्न होती है कि) श्रागम में केवली के दो शुक्ल
ध्यान क्यों कहे गये हैं ? उत्तर :- केवली भगवान के उपचार से ध्यान कहे गए हैं । राजवार्तिक में "एकादशजिने' सूत्र की टीका में प्रकलक स्वामी लिखते हैं 'केवली भगवान में ग्यारह परिषह उपचार से पाये जाते हैं । इस विषय के स्पष्टीकरण हेतु प्राचार्य लिखते हैं -
__ "यथा निरवशेष निरस्त-झानावरण परिपूर्ण ज्ञाने एकाग्रचिता निरोधाभावेऽपि कर्मरजो-विधूनन फल संभवात् ध्यानोपचारः तथा क्षुधादि-वेदनाभाव परीषहाऽभावेऽपि वेदनीय कर्मोदय द्रव्य परीषहसद्भावात् एकादश जिते संतीति उपचारो युक्तः" । (पृष्ठ ३३०) जिस प्रकार ज्ञानावरण कर्म के परिपूर्ण क्षय होने से केवलज्ञान के उत्पन्न होने पर एकाग्रचिता निरोधरूप ध्यान के अभाव होने पर भी कर्मरज के विनाशरूप फल को देखकर ध्यान का उपचार किया जाता है, उसी प्रकार क्षुधा, तृषादि की वेदना रूप भाव परीषह के प्रभाव होते हुए भी वेदनीय कर्मोदय द्रव्यरूप कारणात्मक परीषह के सद्भाव होने से जिन भगवान में एकादश (स्यारह) परिषह होते हैं, ऐसा उपचार किया जाता है ।
उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि केवली भगवान के प्रायुकर्म की अंतर्मुहूर्त प्रमाण स्थिति शेष रहने के पूर्वध्यान का सदभाव नहीं कहा गया है, इसी कारण धवला टीका में सयोगी जिनके विषय में लिखा है. 'सयोगी केवली ए किंचि कम्म खवेदि' (पृ० २२३ भाग १) सयोग केवली किसी कर्म का क्षय नहीं करते हैं। कर्म के क्षपण कार्य का अभाव रहने से सयोगी जिनके ध्यान का अभाव है। इतना