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[ मो. प्र. चिन्तामणि इस प्रकार कथन किया गया है--'सर्वार्थसिद्धि इन्द्रक विमान के ध्वज दण्ड से बारह योजन मात्र ऊपर जाकर आठवीं पृथ्वी स्थित है। उसके उपरिम और अधस्तन तल में से प्रत्येक विस्तार पूर्व पश्चिम में रूप (एक) से रहित एक राजू है। वेत्रासन के समान वहं पृथ्वी उत्तर दक्षिण भाग में कुछ कम सात राजु लम्बी तथा पाठ योजन बाहुल्यवाली है...स्विच सत्तरभार दिहा विचूया. सत्तरज्जूप्रो (८-६५४) । यह पृथ्वी धनोदधि, धनवात और तनुवात इन तीन बात नामक वायुओं से वेष्टित है ।।
प्रश्न :-सिद्धालय में निगोदिया जीव भी रहते हैं, इसका क्या रहस्य है ?
उत्तर :-सिद्ध लोक में सभी सिद्धं जीवों का ही निवास है, ऐसा सामान्यतया लोक में समझा जाता है, किन्तु आगम के प्रकाश में यह भी ज्ञात होता है कि अनन्तान्त सूक्ष्म निगोदिया जीव सर्वत्र लोक में भरे हैं, अतः वे सिद्धालय में भी भरे हुये हैं । इससे यह सोचना कि उन निगोदिया जीवों को कुछ विशेष सुख की प्राप्ति होती होगी, अनुचित है, क्योंकि प्रत्येक जीव सुख-दुःख का संवेदन अपने-अपने कर्मोदय के अनुसार करता है । इस नियम के अनुसार निगोदिया जींद कर्माष्टक के उदय जन्य कष्टों के समुद्र में डूबे रहते हैं और उसी आकाश के क्षेत्र में विद्यमान केवल आत्म प्रदेश वाले सिद्ध भगवान आत्मोत्पन्न परम शुद्ध निराबाध आनन्द का अनुभव करते हैं।
द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा निगोदिया जीव भी सिद्धों के समान कहे जाते हैं, किन्तु परमागम में जिनेन्द्र देव ने पर्याय दृष्टि का भी प्रतिपादन किया है, उसकी अपेक्षा दोनों का अंतर स्पष्ट है। भूल से एकान्त पक्ष की विकार युक्त दृष्टि के कारण मूढजन सर्वथा सब संसारी जीवों को सिद्धों के समान समझ बैठते हैं। और धर्माचरण में प्रमादी बन जाते हैं । स्याद्वाद दृष्टि का प्राश्रय लिए बिना यथार्थ रहस्य ज्ञात नहीं हो पाता है। . . प्रश्न :--सिद्ध भगवान और वीतरागता--कोई यह सोच सकता है कि
भगवान में अनंतज्ञान है, अनन्त शक्ति है और भो अनन्त गरण उनमें विद्यमान हैं। यदि वे दुःखी जीवों के हितार्थ कुछ कृपा करें
तो संसारी जोवों को बड़ी शांति मिलेगी ? उत्तर :---वस्तु का स्वभाव हमारी कल्पना के अनुसार नहीं बदलता है। पदार्थों के स्वभाव को आगम में स्वाश्रित कहा है। बीज के दग्ध हो जाने पर पुनः अंकुरोत्पादन कार्य कहीं हो सकता है, इसी प्रकार कर्म के बीज रूप राग द्वेष भावों का .
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