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अध्याय : पाठवां ]
[ ७२१ सर्वथा क्षय हो जाने से पुनः लोक कल्याणार्थ प्रवृत्ति के प्रेरक कर्मों का भी प्रभाव हो गया है । अब वे वीतराग हो गये हैं । प्रश्न :--प्राचार्य अकलंक देव ने राजवार्तिक में एक सुन्दर चर्चा की है।
शंकाकार कहता है, 'स्थात् एतत् ध्यसनाणंचे निमग्न जमवशेषं जानतः पश्यतश्च कारूण्यमुत्पद्यते । संपूर्ण जगत् को दुःख के सागर में निमग्न जानते तथा देखते हुये सिद्ध भगवान के करुणाभाव उत्पन्न होता होगा । शंका का भाव यह है कि अन्य सरागी, सम्प्रदाय में उनका माना गया काल्पनिक रागद्वेष, मोहादि सम्पन्न परमात्मा जीयों के हितार्थ संसार में प्राता है। ऐसा ही सिद्ध भगवान करते होंगे, यह शंकाकार का भाव है। इस दृष्टि से प्रेरित होकर उपरोक्त पान के पत्रात वह कहता है, 'ततश्चबंधः' जब भगवान के मन में करुणाभाव उत्पन्न होगा तो वे बन्ध
को भी प्राप्त होंगे? उत्तर :- सत्र कि कारणं ? सस्त्रिय-परिक्षयात् भक्ति-स्नेह-कृपा-स्पृहादीना राग विकल्पत्वाद्वीतरामे न ते संतीति (पृ. ३६२, ३६३-१०-४) ऐसा नहीं है, कारण भगवान के सर्व कर्मों का पास्त्रव बन्द हो गया है । भक्ति, स्नेह, कृपा, इच्छा आदि सब रागभाव के ही भेद हैं । वीतराग प्रभु में उन भावों का सद्भाव नहीं है।
प्रश्न :-~-यदि भगवान कुछ काल पर्यंत मोक्ष में रहकर पुनः संसार में प्रा
__ जायें, तो इसमें क्या बाधा है ?
उत्तर :--गभीर चितन से पता चलेगा कि अपने ज्ञान द्वारा जब परमात्मा जानते हैं कि मैं राग, द्वेष, मोहादि शत्रुओं के द्वारा अनंत दुःख भोग चुका है, तब वे सर्वज्ञ, समर्थित तथा प्रात्मानन्द का रसपान करने वाले परमात्मायें पाप-पक में बने का विचार करेंगे ? अपनी भूल के कारण पंजर बद्ध बुद्धिमान पक्षी भी एक बार पिंजरे से छूटकर स्वतन्त्रता का उपभोग छोड़कर पुनः पिंजरे में आने का क्यों प्रयत्न करेगर ? तब निर्विकार, वीतराग सर्वज्ञ-परमात्मा: अपनी स्वतन्त्रता को छोड़कर पुनः माता के गर्भ में आकर अत्यन्त मलिन मानव शरीर धारण करने की कल्पना भी नहीं करेगा । ऐसी कल्पना मनोविज्ञान तथा स्वस्थ विचार धारा के पूर्णतया विरुद्ध होगी।
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