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[ गो. प्र. चिन्तामणि . प्रश्न :---सिद्ध पर्याय प्राप्त करने पर वे भगवान अनन्त काल पर्यंत क्या
___ कार्य करते हैं ? .. उत्तर :- भगवान अब कृतकृत्य हो चके हैं। उन्हें संसार का कोई काम करना बाकी नहीं रहा है। सर्वज्ञ होने से संसार का चिर काल तक चलने वाला विविध रसमय नाटक उनके सदा ज्ञान गोचर होता रहता है। उनं सर्वज्ञ के समान ही शुद्धोपयोग वाला तथा अनन्त गुरग वाला जीव विभाव का प्राश्रय लेकर चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता हुआ अनन्त प्रकार अभिनय करता है। विश्व के रंग मंच पर चलने वाले इस महानाटक का महाप्रभु निर्विकार भाव से प्रेक्षण करते हुये अपनी आत्मानुभूति का रस पान करते रहते हैं ।
एक बात और है-सिद्ध भगवान योगोन्द्रों के भी परम पाराध्य हैं । समाधि के परम अनुरागी योगी जन कहते हैं 1 जितना महान तथा उच्च योगी होगा, उसकी समाधि भी उतनी उच्च प्रकार की होगी । योगी यदि सर्वोच्च हो, तो उसकी समाधि भी श्रेष्ठ रहेगी। सिद्ध भगवान परम समाधि में सर्वदा निमग्न रहते हैं। उनकी आत्म समाधि कभीभी भंग नहीं होती है, क्योंकि अब उन सिद्धों के क्षुधा, तृषादि की व्यथा का क्षय हो गया है। शरीर भी नष्ट हो चुका है। अब दे सिद्ध ज्ञान शरीरी बन गए हैं । इस शुद्ध प्रात्म समाधि में उन्हें अनंत तथा अक्षय श्रानन्द प्राप्त होता है। उस समाधि में निमग्न रहने से उनकी बहिखी वृत्ति की कभी भी कल्पना नहीं की जा सकती है।
जब तक ऋषभनाथ भगवान सयोगी तथा अयोगी जिन थे, तब तक वे सकल-परमात्मा थे। उनके भव्यत्व नाम का पारिणामिक भाव था। जिस क्षण वे सिद्ध भगवान हुये, उसी समय वे निकल-परमात्मा हो गये । भव्यत्व भाव भी दूर हो गया । अभव्य तो वे थे ही नहीं, भव्यपना विद्यमान था, वह भी दूर हो गया, इससे वे अभव्य-भव्य के विकल्प से भी मुक्त हो गये हैं । कैलाश मिरि से एक समय में ही ऋजुगति द्वारा गमन करके भगवान ऋषभदेव सिद्ध भूमि में पहुँच गये हैं । वहां वे अनन्त सिद्धों के समूह में सम्मिलित हो गये हैं । उनका व्यक्तित्व नष्ट नहीं होता है। वेदान्ती मानते हैं, ब्रह्म दर्शन के पश्चात् जीव परम ब्रह्म में विलीन होकर स्वयं के. अस्तित्व से शून्य हो जाता है। सर्वज्ञ प्रणीत परमागम कहता है कि कभी भी सत्.'