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अध्याय : आठवां }
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का नाश नहीं होता है। अतएव सिद्ध-भगवान स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल तथा स्वभाव में सदा अवस्थित रहते हैं
प्रश्न : - क्या एक ब्रह्म की कल्पना अपरसार्थ है ?
उत्तर : - इस प्रसंग में एक बात ध्यान देने की है कि सिद्ध-भगवान आपस
में सभी समान हैं । अनन्त प्रकार के जो संसारी जीवों के कर्मकृत भेद पाये जाते हैं । उनका वहाँ अभाव है। सभी सिद्ध-परमात्मा एक से हैं, एक नहीं हैं । उनमें परस्पर में सादृश्य है, एकत्व नहीं है । अन्य सम्प्रदाय मुक्ति प्राप्त करने वालों का ब्रह्म में fate होना मानकर एक ब्रह्म कहते हैं । स्याद्वाद शासन बताता है कि एक ब्रह्म की पर सुक्ति नहीं है, 'एक' के स्थान में एक सदृश अथवा एक-से कहना परमार्थ कथन हो जाता है ।
प्रश्न :- द्वैत- प्रद्धत किस प्रकार ?
उत्तर :--- सिद्धभूमि में पापात्माओं का भी साम्यवाद है । वहाँ रहने वाले अनन्तानन्त निगोदिया जीव दुःख तथा श्रात्म गुणों के ह्रास की अवस्था में सभी समानता धारण करते हैं। प्रत्येक प्राणी को जीवन में अपनी शक्ति भर सिद्धों के सदृश बनने का विशुद्ध भगीरथ प्रयत्न करना चाहिये ।
जब जीव कर्मों का नाश करके शुद्धावस्था युक्त निकल परमात्मा बन जाता है, तब उसकी अद्वैत अवस्था हो जाती है। आत्मा अपने एकत्व को प्राप्त करता है, और कर्मरूपी माया जाल से मुक्त हो जाता है । मुक्तात्मा की अपेक्षा वह अद्वैत अवस्था है । इस तत्व को जगत् भर में लगातार सभी को श्रद्वैत के भीतर समाविष्ट मानना एकान्त मान्यता है, जो असत्य के भूमि पर अवस्थित होने क्षण भर भी युक्ति तथा सद्विचार के समक्ष नहीं टिक सकती | सिद्ध भगवान बन्धन रूप त अवस्था से छूटकर आत्मा की अपेक्षा अद्वैत पदवी को प्राप्त हो गये हैं । इस प्रकार तस्याद्वाद शासन भी स्वीकार करता है। यह अद्वैत अन्य द्वत का विरोधक नहीं है । जो संहारक प्रत समस्त द्वैत के विनाश को केन्द्रबिन्दु बनाता है, वह तत्काल स्वयं क्षय को प्राप्त होता 1
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अनन्त गुण सम्पन्न होने के कारण सिद्ध-भगवान को अनन्त कहना उचित है । वर्तमान युग के कवि जिस अनन्त की ओर अपनी कल्पना को दौड़ाते हैं, उन कवियों का लक्ष्य यथार्थ में ये अनन्त गुणराशि के भंडार परम प्रभु हैं ।