SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 813
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ७२४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :-निर्वाण भूमि कैसी है ? उत्तर :-ऋषभनाथ भगवान कैलाश पर्वत पर मुक्त हुये, पश्चात् वे सिद्धालय में ऊर्ध्वगमन स्वभाववश पहुँचे। इस दृष्टि से प्रथम मुक्तिस्थल ऋषभनाथ भगवान की अपेक्षा कैलाश पर्वत है, वासुपूज्य भगवान की दृष्टि से चंपापुर है, नेमि जिनेन्द्र की अपेक्षा गिरनार अर्थात् ऊर्जयन्त गिरि है ! वर्धमान भगवान की अपेक्षा पावापुर है, और शेष बीस तीर्थंकरों की अपेक्षा सम्मेद शिखर निरिण स्थल है। निर्वाण कांड में कहा है :-- अष्टापदे वृषभश्चंपायां वासुपूज्य जिननाथः । ऊमयन्ते नेमि जिनः पावायां निवतो महावीरः ।।१५७५॥ विशतिस्तु जिनवरेन्द्राः अमरसुरवन्दिता धुतक्लेशाः । सम्मेदे गिरि शिखरे निरिणं गता नमस्लेभ्यः ॥१५७६।। - सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने पर ज्ञात होगा कि केवलज्ञान होने के पश्चात् भगवान का परम प्रौदारिक शरीर पृथ्वी तल का स्पर्श किया होगा, यह विचार उचित नहीं है । भगवान का कर्मजाल से छूटने का असली स्थान वे आकाश के प्रदेश हैं; जिनको मुक्त होने के पूर्व उनके परम पवित्र देह ने स्पर्श किया था। तिलोयपणत्ति में क्षेत्रमंगल पर प्रकाश डालते हुए लिखा है : एदस्स उदाहरण पावास-परूज्जयंत-चंपावी। पाहु-हत्यपहुदी पणुवोस-व्याहिय परग सयधरित ॥१५७७।। देह अवादि केवलरणारगावा -गयरबेसो था। सेदि-घणमेत्ति अप्पापदेसगद लोयपुरणा पुण्णा ॥१५७८।। इस क्षेत्रमंगल के उदाहरण पावानगर, ऊर्जयन्त गिरि और चंपापुर आदि है। अथवा साढ़े तीन हाथ से लेकर पांच सौ पच्चीस धनुष प्रमारण शरीर में स्थित और केवलज्ञान से व्याप्त प्रकाश के प्रदेशों को क्षेत्रमंगल समझना चाहिये । अथवा जगत श्रेणी के घनमात्र अर्थात् लोक प्रमाण आत्मा के प्रदेशों से लोकपुरण समुद्धात. द्वारा पूरित सभी लोकों के प्रदेश भी क्षेत्रमंगल हैं। । स्वयंभू स्तोत्र में लिखा है कि उर्जयतगिरि से अरिष्ट नेमिजिनेन्द्र के मुक्त होने के पश्चात् इन्द्र ने गिरनार पर्वत पर चरण चिन्हों को अंकित किया था, जिससे , भगवान के निवारण स्थान की सदा पूजा की जा सके । कहा भी है :---
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy