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अध्याय : पाठवां ]
ककुदं भुवः खचर-घोषिदुषित-शिखरैरलंकृतः । मेघपटल-परिवीततटस्तव लक्षणानि लिखिसानि धधिणा ॥१५७६।।
वह उर्जयन्त पर्वत पृथ्वी रूप बैल की ककुद के समान था। उसके शिखर विद्याधरों तथा विद्याधारियों से शोभायमान थे तथा उसका तट मेध पटल से घिरा रहता था। उस पर बनी अर्थात् इन्द्र ने अापके अर्थात् नेमिनाथ भगवान के चरण चिन्हों को उत्कीर्ण किया था।
इस कथन के अनुसार इन्द्र में अन्य तीर्थंकरों के निर्वाण क्षेत्रों पर भी भगवान के चरण चिन्हों की स्थापना की होगी, यह मानना उचित हैं।
जिस काल में भगवान ने मोक्ष प्राप्त किया था, वह समय समस्त पापमल के मलाने का कारण होने से कालमंगल माना गया था। प्रश्न :-- कर्मों के नाश का क्या अर्थ है ? सत् पदार्थ का कभी भी सर्वथा
क्षय नहीं होता है, तब भगवान ने समस्त कर्मों का क्षय किया, __इस कथन का क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :--- यह बात यथार्थ हैं कि सत् का. सर्वथा नाश नहीं होता है और न कमो असत् का उत्पाद ही होता है । समन्तभद्र स्वामी ने कहा है :- "नेवाऽसतो जन्म, सतो न नाशो' अर्थात् असत् का जन्म नहीं होता है तथा सत् का नाश भी नहीं होता है। कर्मों के नाश का अर्थ यह है कि प्रात्मा से उन कर्मों का सम्बन्ध छूट जाता है। उन कर्मों में रागादि विकार उत्पन्न करने की शक्ति दूर हो जाती है। वैसे पदार्थ की शक्ति का नाश नहीं होता है। यहां अभिप्राय यह है कि पुद्गल ने कर्मत्व पर्याय का त्याग कर दिया है। वह पुद्गल कर्म पर्याय के रूप में विद्यमान हैं । अन्य कषायवान् जोव के द्वारा उसे कर्म योग्य बनाने पर पुनः कर्म पर्याय रूप परिणत कर सकता है । मुक्त होने वाली आत्मा के साथ उस पुद्गल का अब कभी पुनः बन्ध नहीं होगा । कर्म क्षय का इतना ही मर्यादा पूर्ण अर्थ करना उचित है।
निर्वारा भूमि को निषिधिका कहा गया है । प्रतिक्रमण ग्रन्थत्रवी में गौतम गणधर मे लिखा है, 'मोत्थुदे खिसीधिये रामोत्थुदे अरहन्त, सिद्ध' (पृ० २०) निषोधिका को नमस्कार है। अरहन्तों को नमस्कार है। सिद्धों को नमस्कार है । संस्कृत टीका में प्राचार्य प्रभाचन्द्र ने निषीधिका के सत्रह अर्थ करते हुए, उसका अर्थ सिद्ध जीव, निर्वाण क्षेत्र, उनके द्वारा आश्रित आकाश के प्रदेश भी किया है, उन्होंने