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[ गो. प्र. चिन्तामणि है, कविवर ने मुनियों की क्रियाओं अर्थात् सराग चारित्र का वर्णन करके सातवें और उससे आगे के गुणस्थानों के वीतराग बारिवरूप स्वरूपाचरण के कथन की यहां प्रतिज्ञा की है।
प्रवचनसार गाथा ११ की तात्पर्य वृत्ति टीका में चारित्र के दो भेद बताये हैं. १ अपहत संयम २ उपेक्षा संयम । इन्हें ही संराग और वीतराग चारित्र अथवा शुभोपयोग और शुध्दोपयोम कहा है ! स्वरूपाचरण चारित्र शुध्दोपयोग ही है और वह सातवें गुणस्थान से प्रारम्भ होकर प्रामे आगे के गुणस्थानों में तारतम्य से निर्मल होता गया है । सो वहां ही स्वरूपाचरण चारित्र होता है। नीचे के गुण स्थानों में नहीं होता । चतुर्थ गुणस्थानों में सम्यक्त्वाचरण होता है । श्रास्मा ही तीर्थ है
तित्थहुदेउलिदेउजिणु सत्वविकोई भरोइ । बेहादेउलि जो भुगइ सो बुह कोयिहवेई ॥१६५२॥
तत्त्वसार ४३. नियमसार ६२ तीर्थ स्थान में व देवालय में श्री जिनेन्द्र देव हैं, ऐसा सब कोई कहते हैं परन्तु जो अपने शरीर रूपी मन्दिर में आत्म देव को पहिचानता है, वह कोई एक पण्डित है।
मूढा देवलि देउरवि सिलि लिप्पइ चित्ति । देहा देवलि देउ जिम सो बुज्झहि समचित्ति ॥१६५३।।
योगसार ४४ है मुढ देव देवालय में नहीं हैं, वह शिला में अथवा लिप्त चित्राकृति में भी नहीं है । देव जिनेन्द्र परमात्मा तो देह देवालय में है-विद्यमान हैं, उन्हें समचित वृत्ति से ही जाना जाता है । निमित्त की प्रबलता
वंसम मोहक्खबरणा पट्टधगो कम्मभूमि जो मणुसो। . . तित्थयर पायमूले केवल सुद केवलि मुले ॥१६५४॥
... लब्धिसार ११० __ जो मनुष्य कर्मभूमि में उत्पन्न हुआ है, तीर्थंकर केवली अन्य केवली के अथवा श्रुत केवली के पादमूल में रहता है, वहीं दर्गनं मोहनीय की क्षपणा का प्रार
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