________________
अन्याय : दसवां ।
[८२५ के अर्थी जैन शास्त्रनि का अभ्यास करौं हैं, तो भी याकै सम्यग्ज्ञान नाहीं । ...
मोक्ष मार्ग. प्र. ७/३४६ मोक्षुत्रितहि जोइया मोक्खरण चितिउ होई। जेग रिसबद्ध जीवउ मोक्खु करे सइ सोइ ॥१६४६॥
परमात्म प्रकाश २/२२८ तं वगुण विशुद्ध जिरण सम्मत्तं सुमुक्खठारणाय । जं चरदिपाण जुत्त परमं । सम्मत्त चारित ॥१६५०।।
प्रा. कुन्दकुन्द ; चरि. पा. २/८ "सं चेवगुरण विशुद्ध तच्चेव सम्यक्त्वं गुरण विशुद्ध', नि: शङ्कितादिभि रष्टगुरणे विशुद्ध निर्मलं । जिरण सम्मत्तं सम्यवत्वं जगत्पति श्रीमद्भगवदर्हत् सर्वज्ञ . वीतरागस्य सम्बन्धिनी श्रद्धा रुद्रादि श्रद्धा न रहितं जिन सम्यक्त्वमुच्यते ।
निशंकित आदि पाठ गुणों से विशुद्ध-निर्मल सम्यस्त्व ही जगत्पति भगवान अर्हत्सर्वत्र-वीतराग सम्बन्धिनी श्रद्धान रूप होता है अर्थात् रागी आदि के श्रद्धान से रहित होता है । वही जिन सम्यक्त्व कहा है और जो सम्यग्ज्ञान सहित आचरण है, वह प्रथम सम्यक्त्व-सम्यक् चारित्र है ।
जिगरमाण विट्टि सुद्ध, पढमं सम्मत्त चरणं चारित । विदियं संजम चरणं, जिगणारण सदेसियं सं पि ॥१६५॥
__ चारित्र पर श्रा कुन्दकुन्द जिनेन्द्र के ज्ञान और उसकी श्रद्धा से शुद्ध प्रथम सम्यकत्वाचरण चारित्र होता है और दुसरा संयमाचरण चारित्र होता है ऐसा जिनेन्द्र देव ने कहा है। स्वरूप में रमण करना स्वरूपाचरण चारित्र है। स्वरूप में रमण करने की स्थिति को ही शुद्धोपयोग कहते हैं, उसे ही निश्चय चारित्र कहा गया है। प्रवचनसार की गा ५ की टीका में-तात्पर्य वृत्ति में जयसेन स्वामी ने कहा है। ... ..
___मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र गुण स्थान गये, 'तारतम्येनाशुभोपयोगः तदनन्तरं मसंयत सम्यग्यदृष्टि, देशविरत, प्रमतसंयत गुणस्थान अये तारतम्ये नः शुभोपयोगः तदनन्तरमप्रमश्रादि क्षीण कषायान्त गुरणस्थान षट्के तारतम्येन शुभदोपयोगः, तदा नन्तरं स योग्य योगी जिन गुणस्थान द्वये शुध्दोपयोगः फलमिति ।
... प्राचार्य श्री इस कथन से पं. दौलतरामजी के कथन का सामंजस्य बैठ जाता