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________________ ८२४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि ENGAROth-phile CART १ जीब के तत्व का अश्रद्धान है, वह मिथ्यात्व का उदय है। २ जीव के विपरीत ज्ञान है, वह अज्ञान का उदय है। ३ जीव का प्रत्याग रूप भाव है वह असंयम का उदय है। (जो है सकल संयम चरित सुनिये स्वरूपाचरण अब) पं. दौलतराम जी स्वरूपाचरण चारित्र सप्तम गुणस्थान का नाम है। प्रात्मनो दर्शने दृष्टि ज्ञान छ योगिनः । स्वरूपाचरणे प्रोक्तं, चारित्रं विश्व वशिभिः ॥ धर्मसंग्रह श्रावकाचार १०११३७ सर्वज्ञ देव ने योगी पुरुषों का आत्मदर्शन (श्रद्धान) सम्यग्दर्शन आत्मज्ञानसम्यरज्ञान और स्वरूपाचारण चारित्र में रमण को सम्यक चारित्र कहा है। कार्माधान किया रोधः स्वरूपा चरणं च यत् । .. धर्मः शुद्धोपयोगः स्यात् सैव चारित्र संज्ञकः ३-१६४८॥ पंचाध्यायी २१७६३ कर्मों के ग्रहण करने की क्रिया का रुक जाना ही स्वरूपाचरण है, वही धर्म है, वही शुध्दपयोग है और चारित्र है। "चारिस खलुधम्मो" प्रा. कुन्द. प्रवचनसार "स्वरूपे चरणं चारित्रम्" आ. अमृत चन्द्र स्वरूप में चरण करना, रमरण करना सो चारित्र है। वस्तु शुद्धद्रव्य शक्तिरूप शुद्ध परिणामिक परम भाव लक्षण पर निश्चय , मोक्षः है । स च पूर्वमेव जीवे तिष्ठतीदानी भविष्यतीत्येवं न। वृ. द्रव्यसंग्रह, गा. .५७/पृ २१४ अर्थ-जो शुद्ध द्रव्य की शक्ति रूप पारिणामिक परम भावरूप लक्षण का धारक, परम निश्चय मोक्ष है, वह तो जीव में पहले ही विद्यमान है । वह परम निश्चय मोक्ष जीव में अब होगा ऐसा नहीं है। तातें आत्मज्ञान शून्य भागमज्ञान भी कार्यकारी नाहीं । या प्रकार सम्यग्ज्ञान HAMANET MOTIONARY MORNDINATOR
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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