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________________ अध्याय : दसवां 1 [ ८२३ प्रश्न :- क्या प्रमस मुरणस्थान में स्वरूपाचरण चारित्र होता है ? उत्तर :---बहुरि इस मिथ्या चारित्र विष स्वरूपाचरण चारित्र का अभाव हैं । तातों याको नाम प्रचारित्र भी कहिए । बहुरि यहां परिणाम मिटै नाही, अथवा विरक्त नाहीं ताते याही का नाम असंयम कहिए हैं । वा अविरत-अविरत कहिये हैं, जातें पांच इन्द्रिय अर मन के विषयन विषै बहुरि पंचस्थावर अर वस · को हिंसा विर्ष, स्वछन्द न होय । अर इनिके त्यागरूप भाव न होय सोई असंयम वा अविरत बारह प्रकार का कह या है, सो कषाय भाव भए ऐसे कार्य होय हैं । तातै मिथ्या चारित्र का का नाम असंयम व अविरति जानना । बहुरी इस ही का नाम अविरत जानना । जाते हिंसा झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह इन पाप कार्यनि विर्षे प्रवृत्ति का नाम अव्रत है। सो इनका मूल कारण प्रमत्त योग कहा है। प्रमत योग है सौ कषाय मय है तातें मिथ्या चारित्र को प्रनत भी कहिये हैं ऐसे मिथ्या चारिन का स्वरूप कहा । मोक्ष मार्ग प्र. 4. टोडरमल ४१२३३-३४ बहुरि जे मुख्यपनै तो निर्विकल्प स्वरूपाचरण विषै हो निमग्न हैं । मोक्ष. मार्ग प्र. ११५ तप तपै द्वादश धरै वृषदशरत्न अय सेवे सका। मुनि साथमें वा एक विचरै चहैं नही भवसुख कदा ॥ यों हैं सकलसंयम चरित्र, सुनिए स्वरूपचरण अय। जिस होत प्रगट प्रापनी मिधिमिटपरकोप्रवृसि सब ॥ छहढाला ६७ बारह प्रकार के तपों को जो सदा तपते हैं, दश प्रकार के धर्मों को जो सदा धारण करते हैं, और रतन त्रय का सदा सेवन करने हैं, मुनियों के साथ व एकाकि विहार करते हैं और संसारिक सुखों की चाहना नहीं करते हैं, ऐसे मुनिराजों का यह सकल संयम है । अब निश्चय चारित्र कहते हैं अर्थात सकल संयंभ धारण करने के बाद प्रकट होने के अनन्तर स्वरूपाचरण चारित्र प्रगट होता है । और इसके प्रकट होने पर आत्मनिधि प्रकट होती है। और पर में जो जीव की प्रवृत्ति होती है वह मिट जातीहै। १ मिच्छत्तस दु उदो जीवस्स प्रसद्हागतं । २ अण्णास्सदु उदयो जं जीवाणं अतच्चउवलद्धी । ३ उदो असंजमस्सदु जं जीवाणं हवेदि अविरमणं ।। समयसार । १३२।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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