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पान
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(गो. प्र. चिन्तामणि का बन्ध करते हैं । अपूर्व करण और अनिवृत्ति करण गुणस्थान वाले जीव आयु के मिना शेष सात कमो का दंभ करते हैं । शुद्धोपयोग का लक्षण
सुविविदपदस्थ जुत्तो-संजम-तय-संजुत्तोविगद रागो। . समणो समसुह दुक्खो, भरिणदो शुद्धो २ प्रायोति ॥१६४६।।
प्र. सा. ११४ पंचारित. १४२ मू० ५६५ जो यति स्व द्रव्यं और पर द्रव्ध को, सूत्रार्थ को भली भांति जानता है । जो भव्यात्मा प्रति पुरुष संयम और तप युक्त है। तथा जो बीतराग भाव से लबालब भरपूर है एवं सुख-दुःख, जिन्होंने समान मान रखा है, ऐसे श्रमण तपस्वी को परमागम में शुद्धोपयोगी कहा गया है।
प्रथरि रूपाध्यायो द्वावे तो हेलुतः समो। साधु साधुरिवारमनी शुद्धो शुद्धोपयोगिनौ ६१७४७॥
पंचाध्यायी २१६६४ अन्तरंग कारण की अपेक्षा विचार करने पर प्राचार्य और उपाध्याय ये दोनों ही समान हैं, साधु के समान प्रात्मज्ञ हैं, शुद्ध हैं और शुद्धोपयोग वाले हैं।
बहुरी जे मुख्यपने से निर्विकल्प स्वरूपाचरण विष ही निमग्न हैं । मो.प्र. २१५ भाव सामायिक का स्वरूपभाव सामायिकं सर्व जीयेषु मैत्री भावोऽशुभ परिणाम वर्जन वा ।
____ अनगारधर्मामृत टीका ८३१६ संसार के सभी जीवों पर मैत्री भाव रखना, अशुभ परिणति का त्याग कर शुभ एवं शुद्ध परिणति में रमण करना भाव सामायिक है।
सममेकत्वेन प्रात्मनि अयः प्रागमनपरद्रव्यभ्यो निवृत्य उपयोगयेस्य आत्मनि प्रवृत्तिः समयः । .मात्मा विषयोपयोग इत्यर्थः ......... अथवा समसमेराग द्वेषा भ्यामनुपहते मध्यस्थे प्रात्मनि अयः उपयोगस्य प्रत्तिः समायः स प्रयोजनमस्येति सामायिकम् ।
__गोम्मट्टसार, जीवकांड टीका गाथा ३६८८ __पर द्रव्यों से निवृत्ति होकर साधक को ज्ञान चेतना जब प्रात्म-स्वरूप में प्रवृत्त होती है, तभी भाव सामायिक होती है। राग द्वेष से रहित मध्यस्थ भावापन प्रात्मा सम कहलाता है, उस सम में गमन करना ही भाव समायिक है।
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