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अध्याय : दसवा ]
[ २२१ सप्तम गुणस्थान का स्वरूप---
संजलगरगोकसायाणुछ प्रो मंदो जवा तदा होधि ।
अपमत्तेमुणो तेराय अपमत्तो संजदो होदि ॥१६४३॥ परम्परा से शुद्धोपयोग-----
___ असंयत सम्यग्दृष्टि-श्रावक-प्रमत्त संयतेषु पारम्पर्येण शुद्धोपयोग उपर्यपरि सारतम्येन शुभोपयोगो वर्तते । .
- व. द्रव्य. ३४.६४ चौथे, पांचवें; छठवें गुणस्थान में परंपरा से शुद्धोपयोग का साधक शुभोपयोग उत्तरोत्तर तारतम्यरूप वृद्धि हुए शुभ परिणामों रूप होता है।
निरतः कास्ननिवृतत्तौ भवतिमतिः समयसार भूतोयम् । यात्वेक देशविरतिनिरतस्तस्यामुपासको भवति ॥१६४४॥
सर्वथा स्व को आरम्भ भावना से निवृत्त रखना यह महाव्रत हैं। और महावत समयसार रूप है । एक देश निवृत होना अणुव्रत है इसमें भथ्यात्मा श्रावक समयसार का उपासक रहता है।
जो कात्सर्न निवृत्ति में मन, वचन, काय से हिंसा भरा, कोपी आदि के त्याग करने रूप निवृत्ति में लवलीन रहता है-तन्मय बना रहता है ऐसा वह यनि मुनि समयसार स्वरूप होता है । और जो इन पूर्वोक्त ५ पापों से एकदेश निवृत-स्याग रूपनिरत्त-लगा रहता है. वह उपासक देशविरति श्रावक-पाराधक का उपासक कहलाता है।
१. परभरा- उत्तरोत्तर क्रम से प्राप्त होना । परम्परा प्राप्त है ।
पारम्पर्यम [परम्पार + ण्यज्] इस परम्परा को प्रमाण मानना चाहिये ।
२. तारतम्य -- [तरतम + ण्यज्) क्रमांकन, सापेक्ष महत्व, अंतर । क्या प्रमत्त अप्रमत्त गुणस्थान में पाठों ही कर्मों का बंध होता है ?
चत्तारि पयडी ठारपाणि तिपि भुजगार अप्पपराणि । मूलपयडीसु एवं अवडिओ चउसुरणादयो ।।१६४५।।
पञ्संग्रह २४१ तथाहि--प्रमत्त प्रमत्तो वा अष्टौ कर्माणि बन्धन अपूर्व करणेऽनिवृतिकरणे च घटितः सन् आयुविना सप्त कर्माणि बन्धति ।।
विशेषार्थ :-- उक्त अर्थ का स्पष्टी करण इस प्रकार है । मिथ्यात्वं गुणस्थान से लेकर प्रमत्त अप्रमत्त गुणस्थान तक के जीव ज्ञाना बरणामादि पाठों ही कर्मों