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________________ ८२० ] [ गोः प्र. चिन्तामरिण पूर्वस्माता तुलिप्तापि घोत वस्त्रान्विता परम् । षोडशाभरणोपेता स्याद्वधूः पूजयेज्ञ्जिनम् ॥१६४० ॥ सती atraditar faनयादि समन्विता । एकाग्रचित्ता प्रयजेज्जिनान् सम्यक्त्वमंडिता ।। १६४१॥ उमास्वामी श्री. पृ. ६३-६४ भावार्थ :-- स्त्रियों में कि जो स्त्री शील मंडित हो, विनयगुण को धारण करती है, सम्यक्त्व मंडित हो, जिनचित्त. प्रत्यन्त चंचल न हो ऐसी स्त्रियां स्नान कर धौत वस्त्र पहन कर शरीर पर लगाकर पहन कर भगवान जिनेन्द्र देव का अभिषेक पूजा कर सकती हैं। श्रावक और श्राविका दोनों को after rate है किसी भी शास्त्रों में निषेध नहीं आया । करना और न करना यह अपने पर निर्भर है कोई स्त्री अभिषेक करे तो दोष नहीं है, क्योंकि पुराणों में जैसी मैना सुन्दरी, अंजना यादि स्त्रियों ने किया । प्रात्मा छद्मस्थ के प्रत्यक्ष उवदेसेणपरोक्संख्वं जह परिपादि । unfe सहेबाधित्यदि जीवोदिट्ठोयगादो य ।।१६४२ ।। समयसार जयसेन. १९८ देखकर वह जाना जाता जैसे किसी का परोक्ष रूप उदेश द्वारा तथा लिखा है, वैसे ही यह जीव वचनों के द्वारा कहा जाता है तथा मन के द्वारा ग्रहण किया जाता है | मानों प्रत्यक्ष देखा गया व जाना गया है । तैसे असंयतं सम्यग्दृष्टि के वितराग भाव रूप मोक्षमार्ग का श्रद्धान भया, ता वा उपचार ते मोक्षं मार्गी कहिये, परमार्थ तं वीतराग भाव रूप परिणमै मोक्ष मार्ग होस । मोक्ष मार्ग प्रकाशक ६-४६३ प्रश्न : - क्या सम्यक्त्व अनुमान का विषय है ? उत्तर :- पञ्चलब्धि का स्वरूप भली भांति : जाना होइ तो आपको समयदृष्टि का अनुमान भी न करें। कोई ऐसा भी कहे हैं, निश्चय करि भगवान सो मेरे सम्यक्त्व है, यह भी श्रद्धान मिथ्या है। यांत सम्यक्त्व अनुमान का विषय नाहीं । भूदरदास, चर्चा. १६.
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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