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अध्याय : दसवां ।
[ १२७ म्भक होता है, क्योंकि दूसरी जगह ऐसी परिणामों की विशुध्दता नहीं हो सकती है। . शुद्धनय से प्रास्मा का स्वरूपः
जो पस्साब अप्पारण प्रबद्ध पुट्ट प्ररणरणयं णियदं । अविसेसमजुत्तं तं सुद्धरण्यं विधारणाहि ।।१६५॥ जो पस्सदि अप्पारणं प्रबद्धपुढे' प्ररणरणमविसेसं । अपदेस सुत्त मग्नं पस्सदि जिरण सासणं सव्वं ॥१६५६॥
समयसार१४/१५ अ, १ प्रश्न - यहां कोई कहे - शास्त्रनिर्ष आत्मा को कर्म नो कम से भिन्न प्रबद्ध
__ स्पष्ट कहा है सो कैसे कह्या है ?
उत्तर-~-सम्बन्ध अनेक प्रकार हैं, तहां तादात्म्य सम्बन्ध अपेक्षा आत्मा को कर्म नो कर्म से भिन्न कहा है। तहां द्रध्य पलटि करि एक नाहिं होय जाय है और इस ही अपेक्षा अबध्द अस्पृष्ट कहा है। बहुरिनिमितनैमित्तिक सम्बन्ध अपेक्षा बन्धन है उनके निमित्त से प्रात्मा अनेक अवस्था धरै हैं। तातै सर्वथा निबन्ध प्रापको मानना मिथ्यादृष्टि है।
मोक्षमार्ग प्र.५/२६१ शुद्धनयादेशात्त पयोगस्वभावस्यश्मनोऽप्रदेशत्वं ।
___ ग्रा, अकलकदेल, तत्वार्थवार्तिक ५/८/२० शुध्दनय की अपेक्षा उपयोग स्वभावी अात्मा अप्रदेशी है, क्षेत्र की अपेक्षा आत्मा असंख्यात प्रदेशी है । द्रव्य की अपेक्षा अप्रदेशी अखण्ड है।। व्यवहार नब भी कार्यकारी--
प्रदीप वदिति झेया व्यवहार नया श्रया । प्राधाराध्यतार्थानां निश्चयात्तद योगतः ॥१६५७॥
श्लोक वार्तिक ५/१६/२ निश्चय नय से सम्पूर्ण पदार्थ अपने-अपने शुध्द स्वरूप में अवस्थित हैं, न कोई किसी का आधार है और न कोई किसी का प्राधेय है, हा व्यवहार नय से
आधार व्यवस्था हो रही है, वस्त्र के समान जीव स्वकीय प्रदेशों का संकीच या विस्तार हो जाने से लोकाकाश से अनेक अवगाहतानों के अनुसार माथित हो