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[ गा. प्र. चिन्तामणि जो बहु जीवाणुरगहकारी यवहारणो सो चेव समस्ति । दथ्योति मरणावधारिय, गोदम थेरेरण मंगलं तस्थ कर्द ।।
- प्रा. वीरसेन स्वामी, जय धवला व्यवहार नय बहुजीबार्नुग्रहकारी है और वही-निश्चय से आश्रय किये जाने योग्य है, ऐसा मन में अवधारण करके ही गौतम देव ने महाकम्मपडि की प्रादि मंगलाचरण किया है। .. प्रश्न--यहां कोई कहे, शुभ भावनि से पाप की निर्जरा हो है पुण्य का बंध
· · हो है, शुद्ध भावनि ते दोउनि को निर्जरा हो है ऐसा क्यों न कहो ?
उत्तर- मोक्षमार्ग विर्षे स्थिति का तो घटना सर्व ही प्रकृतिनि का होय । वहां धुण्य पाप का विशेष है ही नाहीं पर अनुभाग का घटना तो पुण्य प्रकृतिनिका शुध्दोपयोग से भी होता नाहीं। उपरि उपरि पुण्य प्रकृतिनिकै अनुभाग का तीद बंध उदय हो हैं । पर पाप प्रकृति के परमाणु पसटि. शुभ प्रकृति रूप होच, ऐसा संक्रमण शुभ शुध्द दोऊ भाव होते होय । तातै पूर्वोक्त नियम संभव नाहीं । विशुध्दता हो के अनुसारी नियम संभव है।
· मोक्ष मार्ग प्र. पं टो ७४३४१ . मिथ्यादृष्टे वस्तु गजस्नानवत् बंध पूर्विका भवति । तेन कारणमिथ्या दृष्ट्यपेक्षया सम्यग्दृष्टि बन्धक इति । ..
समयसार २६८ प्रारम तत्त्व का विचार भव्य जीवों को
अहम्प्रत्यय वेद्यस्वाज्जीब स्यास्तित्वमन्ययात् । एकोदरिद्र एकोहि श्रीमान इसि च कर्मरणमः ॥ .
पंचाध्यायो ।।१६५८।। इस शरीर में "मैं हूँ, मैं हूँ'' इस प्रकार की जो अनुभूति या ज्ञान होता है, उस ज्ञान से जाना जाता है कि शरीर के भीतर जीव रूप एक शक्ति विशेष है, वह स्वतन्त्र है अथवा मानसिक' प्रत्यय जन्य अहं तयां अवबोध प्रात्मास्तित्व का परिचायक है। इसी प्रकार कोई दरिद्र, कोई श्रीमान्, कोई सर्वाङ्ग और कोई विकलाङ्ग दृष्टि गत होते हैं, वे सर्व कर्म का बोध कराते हैं।