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अध्याय : दसवां ]
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स्वसंवेदनतः सिद्ध. सदात्मा वाद्य वजितात् । ..
सस्य मादि विवर्तात्मन्यात्मन्य नु पसितः ।।१६५६।। ...आस्मा स्वतः स्व संवेदन से सिद्ध है, इसमें कोई भी प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाधा नहीं पा सकती है। पाल्मा को पृथ्वी आदि की पर्याय मनाने से चिद रूप आत्मा को सिद्धो नहीं हो सकती. अर्थात स्व. संवेदन ज्ञान नहीं हो सकेगा। ऐसा होने पर घट-पटादिवत् प्रात्मा जड रूप हो जायेगी, परन्तु यह प्रत्यक्ष बाधित है । इसलिए ताकिक शिरोमरिण प्रा. विद्यानंद स्वामी ...... .
श्लोक वातिक. गा. १०२ स्वसंवेदनमप्यस्य बहिः करण वर्जनात् । अहंकार पदं स्पष्टम बाधमनु मूर्ययते ॥१६६०।।.
बाह्य पञ्चेन्द्रियों से परे “मैं मैं" इस प्रकार बाधा रहित प्रतीति विशद रूप से स्वसंवेदन प्रत्यक्ष इस अन्तरंग यात्मा का अनुभव कराता है ।
सर्वोहि अात्मास्तित्त्वं प्रत्येति न नाहमस्मीति । यदि हि नात्मत्व प्रसिद्धिः स्यात् सवों लोको माहम स्मीति प्रतीयात्
(इ. स. १/१/१/ पर शांकर भाष्य) अहमिति प्रत्यगात्मनि भावात् पराभावादर्थान्तर प्रत्यक्ष ॥१४॥
(अ. ३ आ. २) __ "मैं हूँ इस प्रकार स्वात्मा में अनुभूति होना और पर पदार्थ में न होना, यह प्रात्मा का मानसिक प्रत्यक्ष है।"
"मैं हूँ" यह प्रत्येक मनुष्य को होने वाली प्रतीति ही प्रात्मा के अस्तित्व का सर्वोत्तम प्रमाण है।
लोकमान्यतिलक (दे. सू. शा. भ. ३३, ५३, ५४, गीता १४/४, पारं न याति मेधाऽस्य न मनो नेन्द्रियाणि वा। म गति स्तंत्र शास्त्रारणा, विदुषां न तपस्विनाम् ।।१६६१॥
उस आत्या का पार बुद्धि, मन, इन्द्रियां नहीं पा सकती और शास्त्र भी यथार्थ रूप से वर्णन नहीं कर सकते. इसी प्रकार विद्वान और तपस्वी भी उसका पार नहीं पा सकते हैं।