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[ गो. प्र. चिन्तामरि
अस्थात्मा तु स्वतः सिद्धः स्वानु भूत्यte गोचरः ।
ज्ञान,
दर्शन,
रूपोऽयं
परमानन्द मन्दिरम् ॥१६६२॥
१. आत्मा है वह स्वतः सिद्ध है, २. स्वानुभूत्यैक गम्य है, ३. ज्ञान दर्शन स्वरूप है और मानों ४ परमानन्द का साक्षात् मन्दिर है ।
प्रियो देहात् प्रियाः पुत्रात् प्रियो मातुः पितुस्तथा ।
पत्युः प्रियः प्रियो नार्या मित्रात् भ्रातुः प्रियः प्रियः ॥१६६३॥ न शोयोऽयं न मेयोऽयं ज्ञेयोमेयोस्तथैव च ।
ज्ञातारं न जानीयात् द्रष्टारं लोकयेत् किम् ।।१६६४ ।। श्रस्य नेत्रमेव वा ।
प्रारण एव च ।।१६६५।।
मनसः स मनोज्ञेयः प्रारंगस्य यह आत्मा श्रोत्र का श्रोत्र और चक्षु का चक्षु है, क्योंकि श्रोत्र स्वयं सुनने में वक्षु देखने में असमर्थ हैं। ये आत्मा के कारण ही विषयों को ग्रहण करते हैं । इसी प्रकार यह मन का मन और प्राणों का यह (आत्मा) प्राण है। अर्थात् सभी इन्द्रियामा द्वारा प्रवृत्त होती हैं ।
तात्मकः सत्यं निर्विकल्पो निरामयः ।
fafaशेष निराकारो निरालम्बी निराकुलः ।।१६६६॥ शरण्योऽयं वरेण्योऽयं सुरभ्योऽयञ्च योगिनाम् ।
सर्वथा कल्पनातीतः सर्व शक्ति समन्वितः ॥१६६७॥r
यह ग्रात्मा द्वैताद्वैतात्मक है, सत्य स्वरूप है, निविकल्प और निरामय रूप
है, निविशेष है, निराकार है, निरालम्ब है, निराकुल है ।
यह आत्मा शरण्य है, वरेण्य है तथा योगियों के लिए परम रम्य है । यह कल्पनातीत और सर्वशक्तिमान है ।
तं विद्यात् सर्व भावेन सर्वयत्नेन चाप्नुयात् ।
atra चिन्तनं कुर्यात् "निजानन्द" निजात्मनि ।। १६६८।। सर्वभावों और प्रयत्नों से इस श्रात्मा को जानना चाहिये । रवि होदि अप्पमतो सयमसो जाणजोदु जो भावो । जो सो दु सो क्षेत्र ॥। १६६६॥ एवं भांति सुद्ध णादो
समयसार प्रा. कुन्द कुन्द