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________________ ...Mammm. अध्याय : दसवां । [ ८३१ जो एक ज्ञायक भाव है, यह अपने आप से सिद्ध है, किसी से उत्पन्न नहीं हुना है । उस भाव से तो अनादि सत्ता रूप है और कभी उस ज्योति का विनाश नहीं होता, इसलिए अनन्त है, नित्य उद्योत रूप है, इस कारण क्षणिक नहीं है । ऐसी स्पष्ट प्रकाशमान ज्योति है, वह संसार की अवस्था में अनादि बंध पर्याय की निरूपणा (अपेक्षा) से कर्मरूप पुद्गल द्रव्य सहित दूध, जल की तरह होने पर भी द्रव्य के स्वभाव की अपेक्षा से देखा जाय तब तो जिसका गिटना कठिन है, ऐसे कषायों के उदय की विचित्रता से प्रवृत्त हुए पुण्य पाप के उत्पन्न करने वाले समस्त अनेक रूप शुभ अशुभ भाव के स्वभाव से परिणमन नहीं करती है। ज्ञायक भाव से जड़भावरूप नहीं होती। इसलिए प्रमत्त भी नहीं है और प्रगत नहीं है, यही . मस्त अन्य द्रव्यों के भावों से भिन्न रूप में सेवित हुआ 'शुद्ध' ऐसा कहा जाता है। और इसका ज्ञेयाकार होने से ज्ञायकत्व प्रसिद्ध है। जैसे दाहने योग्य जो दाह्य ईंधन यद्यपि उसके आकार अग्नि होती है। इसलिए अग्नि को दहन कहते हैं, तो भी अन्नि तो अग्नि ही है । ईंधन अग्नि नहीं है । उसी तरह ज्ञेय रूप आप नहीं है, आप तो ज्ञायक रूप ही है । इस तरह उस ज्ञेय के द्वारा की हुई भी इस आत्मा के अशुद्धता नहीं है, क्योंकि ज्ञेयाकार अवस्था में भी ज्ञायक भाव द्वारा जाना गया जो अपना ज्ञायकत्व वहीं स्वरूप प्रकाशन की जानने की अवस्था में भी ज्ञायकरूप ही है, ज्ञेय रूप नहीं हुमा । क्योंकि अभेद विवक्षा से कर्ता तो आप शायक और अपने को कर्म जाना---ये दोनों एक आप ही है, अन्य नहीं है । जैसे दीपक घटपटादि को प्रकाशित करता है, उनके प्रकाशने की अवस्था में भी दीपक ही है। वही अपनी ज्योति लौं के प्रकाशने की अवस्था में भी दीपक ही है, कुछ दूसरा नहीं है । भावार्थ-अशुद्धता परद्रव्य से संयोग से आती है । वहां मूल द्रव्य तो अन्य द्रव्य रूप होता ही नहीं । कुछ पर द्रव्य के निमित से अवस्था मलिन हो जाती है । उस जगह द्रव्यदृष्टि से तो द्रव्य जो है वही है और पर्याय दृष्टि से देखा जाय तब वह मलिन ही दिखता है । उसी तरह प्रात्मा का स्वभाव ज्ञायकत्व मात्र ही है, और उसकी अवस्था पुद्गल कर्म के निर्मित से रागादि रूप मलिन है, वह पर्याय है । उसकी दृष्टि से देखा जाये तब मलिन ही दीखता है। और द्रव्यदृष्टि से देखा जाय, तब ज्ञायकत्व तो ज्ञायकत्व ही है, कुछ जडत्व नहीं हुमा । यहां पर द्रव्य दृष्टि को प्रधान कर कहा है। जो प्रमत्त अप्रमत्त का भेद है, वह तो पर द्रदय की संयोगजनित पर्याय है.
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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