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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि SNKARKON NA PAN प्रश्न :--पंचम गुणस्थान में कितने प्रतियों का बंध होता है ? । उत्तर :- चौथे गुरणस्थान में जिन ७७ प्रकृतियों का बन्ध कहा है, उनमें से व्युच्छिन्न दस के अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, मनुष्यर्गात, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, मनुष्यायु, औदारिकशरीर, औदारिकांगोपांग वर्षभनाराचसंहनन के ) घटाने पर शेष ६७ प्रकृतियों का देशविरत नामक पंचम गुणस्थान में बन्ध होता है । प्रश्न :-पंचम गुणस्थान में कितनो प्रकृतियों का उदय रहता है ? उत्तर :- चौथे गुणस्थान में जिन १०४ प्रकृतियों का उदय' कहा है, उनमें से व्युच्छिन्न: सत्रह प्रकृतियों के (अप्रत्याख्यानावर क्रोध, मान, माया, लोभ, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, देवायु, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, नरकायु, वैक्रियक शरीर, वैक्रियकांगोपांग, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, दुभंग अनादेय, अयशस्कीति के) घटाने पर शेप रही ८५ प्रकृतियों का पञ्चम गुरगस्थान में उदय होता है। प्रश्न :-पंचम गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्व रहता है ? उत्तर :--चौथे मुरगस्थान में जिन १४८ प्रकृतियों का सत्व कहा है, उनमें से व्युच्छिन्न प्रकृति एक नरकायु के बिना १४७ का सत्त्व रहता है, किन्तु क्षायिक . सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा से १४० का ही सत्व रहता है। प्रश्न :-छठवे गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बन्ध होता है ? उत्तर :- पंचम गुणस्थान में जिन ६७ प्रकृत्तियों का बंध होता है, उनमें से प्रत्याख्याना वरण क्रोध, मान, माया, लोभ इन ४ ब्युच्छिन्न प्रकृतियों को घटाने पर । शेष ६३ प्रकृतियों का प्रमतविरत नामक छठव में बन्ध होता है । . प्रश्न :- छठ गुणस्थान में कितनी प्रकलियों का उदय होता है ? उत्तर :--पंचम. गुणास्थान में जिन ८७ प्रकृतियों का. उदय रहता है, उनमें से व्युच्छिन्न ग्रांठ प्रकृतियों के (प्रत्याख्यानावरमा क्रोध, मान, माया, लोभ, तिर्यञ्चगति, तिर्यग्गायु, उद्योत और नीचगोन के) घटाने पर शेष ७९.. प्रकृतियों में प्राहारक शरीर और ग्राहारक. प्रांगोपांग इन दो प्रकृतियों को। मिलाने से ८१ प्रकृतियों का इस गुणस्थान में उदय होता है।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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