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________________ अध्यायः : पहला ] [ ३१ नहीं होता है, इसलिये छिहतर में से मनुष्यायु और देवायु इन दो के घटाने . पर तृतीय मिश्र गुणस्थान में ७४ प्रकृतियों का बन्ध होता है । नरकाबु की पहले गुणस्थान में और तिर्यञ्चायु की दूसरे गुणस्थान में ही व्युच्छित्ति हो जाती है। ..... प्रश्न :- पृतीय पुराना किसानी गतियों का उदय होता है ? उत्तर :---दूसरे गुणस्थान में १११ प्रकृतियों का उदय होता है । इनमें से व्युच्छिन्न प्रकृतियों ६ को (अनन्तानुबंधी ४, एकेन्द्रियादिक ४, स्थावर १ को) घटाने पर शेष १०२ में से नरकगत्यानुपूर्वी के बिना (क्योंकि यह दूसरे गुरणस्थान में घटाई जा चुकी है)। शेष की तीन आनुपूर्व घटाने पर (क्योंकि तीसरे गुरणस्थान में मरणा न होने से किसी भी प्रानुपूर्वी का उदय नहीं होता) शेर ६६ प्रकृतियां और एक सम्यक् मिथ्यात्व प्रकृति का उदय यहां होता है, इस कारण इस गुणस्थान में १०० प्रकृतियों का उदय होता है। प्रश्न :--- तृतीय गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्य रहता है ? उत्तर :- तृतीय गुस्थान में तीर्थङ्कर प्रकृति के बिना १४.७ प्रकृतियों का सत्व रहता है। प्रश्न :----अविरत चतुर्थ गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बंध होता है ? उत्तर :-तृतीय (मिश्र) गुणस्थान में ७४ प्रकृतियों का वन्ध होता है । उसमें मनुष्यायु, देवायु और तीर्थंकर प्रकृति मिलाने पर ७७ प्रकृतियों का बन्ध होता है। प्रश्न :---चतुर्थ गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का उदय होता है ? . उत्तर :--तृतीय गुणस्थान में १०० प्रकृतियों का उदय होता है, उसमें से व्युच्छिन्न प्रकृति सम्यक् मिथ्यात्व को घटाने पर रही ६६ इनमें चार आनुपूर्वी और एक सम्यकप्रकृति मिथ्यात्व इन पांच प्रकृतियों की मिलाने पर चौधे गुणस्थान में १०४ प्रकृतियों का उदय होता है । प्रश्न - चौथे गुरणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्व रहता है ? तर:-सवका अर्थात् १४८ प्रकृतियों का, किन्तु क्षायिक सम्यग्दृष्टि के १४१ का ही सत्व रहता है। HTTARAKRA RA LIVERY
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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