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________________ ३० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि उत्तर :-- दूसरे गुणस्थान में १०१ प्रकृतियो का बंध होता है । क्योंकि सोलह प्रकृतियां कम हो जाती हैं । १७ प्रकृतियों का बंध पहले गुणस्थान में होता था, इसमें से १६ प्रकृतियों की व्युच्छिति हो जाती है, सो १६ घटाने पर १०१ रह जाती है, इन्हीं का इस गुणस्थान में बंध होता है । - व्युच्छित्ति किसे कहते हैं ?. प्रश्न उत्तर :- जिस गुम्पस्थान में जिन कर्म प्रकृतियों का बन्ध, उदय अथवा सत्य की व्युच्छित्ति कही है। उस गुणस्थान तक ही उन प्रकृतियों का बन्ध, उदय, अथवा सत्त्व पाया जाता है। यागे के किसी भी गुणस्थान में उन प्रकृतियों का वन्ध, उदय अथवा सत्त्व, नहीं होता है, इसी को व्युच्छित्ति कहते है । - द्वितीय गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का उदय होता है ? प्रश्न ----- उत्तर :- पहिले गुणस्थान में जो ११७ प्रकृतियों का उदय होता है उनमें से मिथ्यात्व आतप, सूक्ष्म, पर्याप्त और साधारण इन पांच को मिथ्यात्व गुणस्थान की व्युच्छिन्न प्रकृतियों से घटाने पर १९२ रही । परन्तु नरकगत्यानुपूर्वी का इस गुगुणस्थान में उदय नहीं होता, इसलिये इस गुणस्थान में १११ प्रकृतियों का उदय होता हैं । प्रश्न :- द्वितीय गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का सत्त्व रहता है ? उत्तर :- इस द्वितीय गुणस्थान में तीर्थंकर, ग्राहारक शरीर और आहारक गोपांग ये तीन नहीं रहती हैं, इसलिये इस गुगा स्थान में एक सौ पैतालिस का सत्व रहता है । प्रश्न :--- - तृतीय गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बंध होता है ? उत्तर :- तृतीय गुणस्थान में बन्धयोग्य प्रकृतियां १०१ थीं, उनमें से व्युच्छित प्रकृतियां पच्चीस, (अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, दुर्भग, दुःस्वर, प्रनादेय, न्यग्रोध परिमंडल संस्थान, स्वातिसंस्थान, कुब्जक संस्थान, वामनसंस्थान, अजूनाराचसंहनन, नाराच संहनन, श्रद्ध नाराचसंहनन, कोलित संहनन, अप्रशस्त विहायोगति, स्त्री वेद, नीचगोत्र, तिर्यगति तिर्यचगत्यानुपूर्वी, तिर्यगायु, उद्योत ) घटाने पर शेष रही ७६ प्रकृतियां । परन्तु इस गुणस्थान में किसी भी प्रयुकर्म का बन्ध
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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