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________________ अध्याय: पहला ] नरकायु, तिर्यञ्चायु, मनुष्यायु और देवायु 1 [ २ कर्म किसे कहते हैं ? और उसकी कितनी प्रकृतियां हैं ? प्रश्नः उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव का आकार विग्रहगति में पूर्वपर्याय जैसा बना रहता है, उसे क्षेत्रविपाको कर्म कहते हैं, उसके चार भेद हैं- चारों गत्यानुपूर्वी । प्रश्न :- मिथ्यात्व गुणस्थाने में कौन-कौनसी प्रकृति का बन्ध होता है ? उत्तर :- कर्म की १४८ प्रकृतियों में स्पर्शादिक २० प्रकृतियों का अभेदविवक्षा से स्पर्शादिक चार में तथा बन्धन ५ और संघात ५ का, प्रभेद विवक्षा से पांच शरीरों में अन्तर्भाव होता है । इस कारण भेदविवक्षा से सर्व १४८ और भेदविवक्षा से १२२ प्रकृतियां बंध योग्य हैं । सम्यङिमथ्यात्व और सम्यक्प्रकृति इन दो प्रकृतियों का बंध नहीं होता ? क्योंकि इन दोनों प्रकृतियों की सत्ता सम्यक्त्व परिणामों से मिथ्यात्व प्रकृति के तीन खण्ड करने से होती है, इस कारण अनादि मिथ्यादृष्टि जीव की यन्ध योग्य प्रकृतियां १२० श्रीर सवयोग प्रकृतियां १४६ हैं । मिथ्यात्व गुणस्थान में तीर्थंकर प्रकृति, ग्राहारक शरीर और श्राहारकांगोपांग इन तीन प्रकृतियों का बन्धन नहीं होता, क्योंकि इन तीन प्रकृतियों का बन्ध सम्यग्दृष्टि के ही होता है । इसलिये मिथ्यात्व गुरणस्थान में ( १२० में ) ३ घटाने पर ११७ प्रकृतियों का बन्धे होता है । प्रश्न :- मिथ्यात्व गुरुस्थान में कितनी प्रकृतियों का उदय होता है ?. उत्तर : सम्यक् प्रकृति, सम्यक् मिथ्यात्व आहारक शरीर, ग्राहारकागोपांग और तीर्थकर प्रकृति इन पांच प्रकृतियों का मिथ्यात्व गुरुणस्थान में उदय नहीं 'होता, इसलिये १२२ में पांच घटाने पर ११७ का प्रकृतियों उदय होता है । प्रश्न :- मिथ्यात्व गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों की सत्ता (सत्त्व) रहती है ? - मिथ्यात्व गुणस्थान में १४८ प्रकृतियों का सत्ता ( सत्त्व) रहती है । - दूसरे गुणस्थान में कितनी प्रकृतियों का बंध होता है ? उत्तर :---- प्रश्न : -- जैन दर्शन में मिथ्यात्वादि १४ गुणास्थानों की चर्चा की गई हैं। प्रत्येक गुणस्थान में प्रकृतियों के बन्ध, उदय, सत्यं की चर्चा यहां से आगे करते हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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