SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 80
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ .. घातिका [ गो. प्र. चिन्तामणि वेदनोग्र के २, आयु के ४, नाम ९३ और गोत्र के २ कुल मिलाकर प्राथा शिया कर्म के १०१ भेद होते हैं। प्रश्न :--सर्वघाति कर्म किसे कहते हैं और उसके कितने भेद हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के उदय से अनुजीवी गुणों का पूर्ण रूप से घात होता हो, उसे सर्व घाति कर्म कहते हैं। केवलज्ञानावरण एक, केवल दर्शनावरण एक, नीद्रा ५, अनन्तानुबन्धि की ४, अप्रत्याख्यानावरण की ४, प्रत्याख्यानावरण की ४, मिथ्यात्व १ और सम्याड्.िमथ्यात्व १ कुल मिलाकर २१ प्रकृति सर्वघाति हैं। प्रश्न :--देशधाति कर्म किसे कहते हैं ? और उसके कितने भेद हैं ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से जीव के अनुजीवी गुरंगों का एक देश घात होता है, उसे देशवाति कर्म कहते हैं। मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञाना. वरा, मनः पर्यज्ञानावरण, चक्षुदर्शनाबरण, अचक्षुदर्शनावरगा, अवधि दर्शनावरगा, संज्वलन ४, नोकपाय है, एक सम्यकत्व, पांच अन्तराय ग्रे-संव मिलाकर छदिवस देशघाति कर्म हैं। प्रश्न :---जीव विपाकी कर्म किसे कहते हैं ? और उसके कितने भेद हैं ? .. उत्तर :--जिस कर्म का फल जीव में होता है उसको जीव विपाकी कर्म कहते हैं। इसके अठहत्तर भेद हैं । वातिया के ४७, गोत्र के २, वेदनीय के २, तीर्थकर प्रकृति, उच्छवास, बादर, सूक्ष्म, पर्याप्ति, अपर्याप्ति, सुस्वर, दुस्वर, आदेय, अनादेय, यश: कीति, अयशः कीर्ति, बस. स्थावर, प्रशस्तविहायोगति, अप्रशस्तविहायोगति, सुभग, दुर्भग, गति ४, जाति ५ सब मिलकर अठहत्तर भेद होते हैं। . प्रश्न :--पुद्गल विपाकी कर्म किसे कहते हैं ? और उसके कितने भेद है ? . उत्तर :-जिस कर्म का फल पुद्गल में होता है, उसे पुद्गल विपाकी कहते हैं। इसके बासठ भेद हैं। कुल कम 'प्रकृतियां १४८ हैं, उनमें से क्षेत्र विपाकी ४, भवविपाकी ४, जीवविपाकी ७८ इस प्रकार ८६ प्रकृतियां घटाने से जप ६२ प्रकृतियां पुद्गल विपाकी हैं । प्रश्न :-भबविपाको कर्म किसे कहते हैं ? भवबिपाको प्रकृतियां कितनी हैं ? उत्तर :-जिस कर्म के फल से ‘जीवपर्याय में रहता है, इसकी चार प्रकृतियां हैं PrastriANJA
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy