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अध्याय: पहला ]
समचउरबज्जरिसहं उवघा गुरू छक्क सग्गमरणं । तसवारसठुसठ्ठी, बादालम
भेददो
सस्था || १
प्रश्न :- पापप्रकृतियां कौन-कौनसी हैं ?
उत्तर:-- चारों घातिया कर्म की सैंतालीस प्रकृतियां, असातावेदनीय, नीचगोत्र, नरक आयु, समचतुरस्त्र संस्थान विना पांच संस्थान वज्वर्षभनाराच संहनन बिना, पांच संहनन, पांच वर्ण, पांच रस, नरक गत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगत्या नुपूर्वी, नरकगति, तिर्यंचगति, याठ स्पर्श, गंध दो, पंचेन्द्री, बिना चारों इंन्द्रियां 'वस्था, स्तविहायोगति, अस्थिर, अपर्याप्त सुक्ष्म, साधारण. उपवान, स्थावर, अशुभ, दुर्भग, दुस्वर, श्रनादेय, अयमकीति इन सब को मिलाकर सौ पाप प्रकृतियां हैं ।
इको गोम्मटसर में इस प्रकार गाथा बद्ध किया है—
"वादी गोवप्रसाद गिरयाऊ गिरयतिरियदुग जादी संठासंहृदां चदुपपरागं च बगायो ॥ उवषादमग्गमं थावरस्यं च अप्पसत्था हु । बंधुदयं पडि भेदे उदि सयं दुचदुरखीदिदरे ॥२ प्रश्न :- घातिया कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिसके उदय से जीव के ज्ञानादिक अनुजीवी गुणों का घात होता है, उसे घातिया कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :-- घातिया कर्म के कितने भेद हैं ?
उत्तर :- ज्ञानावरण के ५, दर्शनावरण के
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मोहनीय के २८ औ अन्तराय के ५ कुल मिलाकर घातिया कर्म के सैंतालिस भेद होते हैं ।
प्रश्न :-- प्रघातिया कर्म किसे कहते हैं ? और उसके किसने भेद हैं.
?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से जीव के ज्ञानादि अनुजीवी गुणों का घात नहीं होता,
उसे अघातिया कर्म कहते हैं ।
गोम्मटसार: कर्मकाण्ड : गाथा ४१-४२ Tracer: कर्मकाण्ड : गाथा ४३, ४४ ।