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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रश्न :--स्थिति बंध किसे कहते हैं ? उत्तर :-जानावरणादि कमी का अपने स्वभाव से चुत नहीं होने वाला स्थिति
बंध है। प्रश्न :-- अनुभाग बंध किसे कहते है ? उत्तर :--ज्ञानावरादि कर्मों में तोछ या मंद आदि फल देने की शक्ति को अनुभाग
बंध कहते हैं। प्रश्न :--ज्ञानावरमादि कर्मों को उत्कृष्ट स्थिति कितनी है ? उत्तर :-ज्ञानाबरण, दर्शनावरण, बेदनीय और अन्तराय इन चार कर्मों की उत्कृष्ट.
स्थिति तीस कोड़ाकोंडी सागर है। इस उत्कष्ट स्थिति का बन्ध संजी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।
मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोडाकोड़ी सागर की है। नाम, गोत्र की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोडाकोड़ी सागर की है। प्रायु कर्म
की उत्कृष्ट स्थिति तैतीस कोड़ा कोड़ी सागर है ! प्रश्न :-ज्ञानावरमादि कर्मों की जघन्य स्थिति कितनी है ? उत्तर :-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय और आयु इन पांच कर्मों की
जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है । वेदनीय कर्म की जयन्य स्थिति बारह मुहूर्त
है । नाम व गोत्र की जघन्य स्थिति पाठ मुहूर्त है । प्रश्न :-पुण्यप्रकृतियां कौन-कौनसी हैं ? उत्तर :--देवायु, मनुष्यायु, तिर्यंचायु, सातावेदनीय, उच्चगोत्र, प्रशस्तगति, देवगति,
मनुय्यगति, देवगत्यानुपूर्वी, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, निर्मामा, श्वासोच्छ्वास, बंधन ५, संघात ५, देह ५, वर्ण ५, रस. ५, (स) तीन ग्रांगोपांग, शुभ, गन्ध २, आठ स्पर्श, अगुरुलघु, पंचेन्द्रिय, समचतुरस्र संस्थान, वज्रर्षभनाराचसंहनन, बादर, प्रत्येक, स्थिर, पर्याप्त, यसकोति, आतप, उद्योत, परघात, मुस्वर, सुभग, प्रादेय और तीर्थंकर ये ६८ पुण्यप्रकृतियां हैं । कर्मकाण्ड में इसे इस प्रकार गाथाबद्ध किया है.----.
"सादं तिरणेबाऊ उच्च गगर सुर दुगं च पंचिदी । देहा बन्धासंघा - देगो वंगाई · वगंगा चनो ।
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