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अध्याय: पहला ]
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- जिस कर्म के उदय से दानादिक में विघ्न होता है, उसे अन्तराय कर्म कहते हैं । इसके पांच भेद हैं- १. दानाय २. लाभान्तराय, ३. भोगांन्तराय, ४. उपभोगान्तराय और ५. बीर्यान्तराय |
उत्तर :
प्रश्न :- दानान्तराय किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से दान देने की इच्छा होते हुए भी प्राणी दान नहीं कर सुकता, उसे दानान्तराय कहते हैं । इसी प्रकार और भी अन्तरायों का स्वरूप जान लेना ।
प्रश्न :-बंध कितने प्रकार का है और बंध का लक्षण क्या है ?
- यंत्र चार प्रकार का है। प्रकृति बंध, प्रदेश बंध, स्थिति बंध और अनुभाग बंध । अव बंध का लक्षण बताते हैं । कार्मणवर्गगारूप पुग्दले सम्पूर्ण लोक में ठसाठस भरे हुए हैं, कषाय के निमित से आत्मा के साथ, उनका सम्बन्ध हो जाता है | यही बन्ध कहलाता है । जैसे तत्वार्थ सूत्र में परिभाषा दी हैसकषायत्वाज्जीव: कर्मगो योगान्पुद्गलानादत्ते स बन्धः । १
उत्तर :
प्रश्न :-- कौनसा बंध किससे होता है ?
उत्तर
- प्रकृतिबंध और प्रदेशबंध योग से होते हैं। स्थितिबंध और अनुभागयंव कषाय से होते हैं ।
प्रश्न :- प्रकृति बंध किसे कहते हैं ?
उत्तर :- कर्मों में ज्ञानादिक के ढ़कने का स्वभाव प्रकृति बन्ध है ।
प्रश्न :-- प्रदेश बंध किसे कहते हैं ?
उत्तर :- आत्मा के योग-विशेषों द्वारा त्रिकाल में बंधनवाने, ज्ञानावरगादि कर्म प्रकृतियों के कारणभूत श्रात्मा के प्रदेशों में व्याप्त होकर कर्मरूप परिणम ने योग्य, सूक्ष्म, आत्मा के प्रदेशों में क्षीरनीर की तरह एक होकर स्थिर रहने वाले तथा अनन्तानन्त प्रदेशों का प्रभाग लिये प्रदेश बन्धरूप पुग्दल को प्रदेशवन्ध कहते हैं । कहा गया है
"नाम प्रत्ययाः सर्वतो योग विशेषात् सूक्ष्मक क्षेत्रावगाहस्थिताः सर्वात्म प्रदेशेश्वनन्तानन्त प्रदेशाः ।"२
तत्वार्थ सूत्र - अध्याय ८ सूत्रः २ । २. तत्वार्थ सूत्र ः अध्यायः ८, सूत्रः २४ ।