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[ गो. प्र. चिन्तामरिंग ___ धनश्री नाम की सेठानी ने हिंसा से बहुत प्रकार का दुःखदायक फल भोगा है। सत्यप्रोष पुरोहित ने असत्य बोलने से, तापस ने चोरी से और कोतवाल ने ब्रह्मचर्य का प्रभाव होने से बहुत दुःख भोगा है। इसी प्रकार प्रमथ नवनीत नामकः वरिण क ने परिग्रह पाप के कारण दुःख भोगा है।
प्रश्न :..-गृहस्थों के प्रष्ट मूलगुरषों के क्या स्वरूप हैं ?
उत्तर :-मुनियों में उत्तम. गणधरादिक देव मद्यत्याग, मांसत्याग'. और मध्रुत्याग के साथ पांच अणुक्तों को गृहस्थों के आठ मूलगुण कहते हैं ।
'मद्य मांस मधु त्यागैः सहाणुवत पञ्चकम् । अष्टो मूल गुणानाहु गृहीणां श्रमरणोत्तमाः ।।५२।। . . .
श्रमण, श्रवण अथवा प्रामन ये सब मुनियों के नाम हैं। इनमें जो उत्तम गणधरा दिक देव हैं, वे श्रमरणोत्तम कहलाते हैं। उन्होंने गृहस्थों के पाठ मूलगुण इस प्रकार वतलाये है--१. मद्य त्याग २. मांस त्याग ३. मधु त्याग ४. अहिंसाणुव्रत । ५. सत्याणुव्रत ६. अचौर्याणुक्त ७. ब्रह्मचर्याण व्रत और ८. परिग्रह परिमाण क्त ।
विशेषार्थ----मूलगुग मुख्य गुणों को कहते हैं । जिस प्रकार मूल-जड़ के बिना वृक्ष नहीं ठहरते इसी प्रकार मूलगुणों के बिना मुनि और श्रावक के व्रत नहीं ठहरते। इस तरह मूलगुण का वाच्यार्थ अनिवार्य अावश्यक गुण है । मुनियों के २८ मूलगुण होते हैं और शावकों के ८ । श्रायकों के मूलं गुणों का उल्लेख कई प्रकार से मिलता है। सबसे पहला उल्लेख समन्तभद्र स्वामी का है, जिसमें उन्होंने मद्य त्याग, मांस त्यांग, मधु त्याग और अहिंसा आदि पांच प्रणवत सम्मिलित किये हैं । उनका अभिप्राय ऐसा जान पड़ता है कि मुनियों के २८ मूलगुणों में पांच महाव्रत सम्मिलित हैं, तो गृहस्यों के आठ मूलगुरणों में पांच अगा व्रतों को स्थान दिया है । मद्यत्याग आदि यद्यपि अहिसागा वृत के अन्तर्गत हो जाते हैं, तथापि विशेषता बतलाने के लिए उनका ।
पृथक् से उल्लेख किया है । आगे चलकर जिनसेन' स्वामी ने मधु त्याग को । : - मांस त्याग में गभित कर उसके स्थान में श्रुतत्याग का उल्लेख किया है। जिनसेन ... के परवर्ती प्राचार्यों ने और भी सरलता करते हुए पांच अरण बतों के स्थान पर पांच ३
उदुम्बर फलों के त्याग का समावेश किया है । इनके सिवाय ५० अाशाथर जी ने . सागार धर्मामृत में एक मत का और भी उल्लेख किया है, जिसके आधार पर निम्नलिखित पाठ मल गना. माने जाते हैं।