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की अपेक्षा दो प्रकार के हैं । जो अणुव्रत धारण करने के पहले प्रायु बांध चुके हैं, वे बदायुष्क कहलाते हैं और जो अणुनतों के काल में आयु बांधलें हैं, वे अवद्धायुष्क कहलाते हैं । ये दोनों प्रकार के जीव नियम से देव ही होते हैं। क्योंकि ऐसा नियम है कि देवायु को छोड़कर जिस जीव को अन्य प्रायु का बन्ध हो गया है, वह उस पर्याय में अणुअत तथा महाप्रत धारण नहीं कर सकता और अणुव्रत के काल में यदि अायु बंध होला है, तो नियम से देवायु का ही बंध होता है । देवायु में भी वैमानिक देवायु का हो बन्ध होता है । अण ब्रत धारण करने के पूर्व यदि किसी की मिथ्यादृष्टि अवस्था है, तो उसमें भवनत्रिक की देवायु बंध सकती है, परन्तु अग अत होने पर भवनत्रिक की आयु बैमानिक की यायु के रूप में परिवर्तित हो जावेगी । अरण नतों का बारी जीव सोलहवें स्वर्ग तक ही उत्पन्न हो सकता है, उसके आगे नहीं । उसके आगे नव बेय . प्रादि में उत्पन्न होने के लिये निर्ग्रन्थ मुद्रा का धारण करना आवश्यक है।
प्रश्न :--पाँची अणुव्रतों को पालन करने से किसको क्या फल मिला ?
उत्तर :---यमपाल नाम का चाण्डाल धनदेव उसके बाद वारिपेरण नाम का राजकुमार और जयकुमार ये क्रम से अहिंसादि अणुव्रतों में उत्तम पूजा के अतिशय को प्राप्त हुए हैं।
मातंगो धनदेवश्च वारिषेणस्ततः परः । . - नीली जयश्च संप्राप्ताः पूजातिशयसुत्तमम् ॥५०॥
हिंसाविरति नामक अणुक्त से यमपाल चाण्डाल ने उत्तम प्रतिष्ठा प्राप्त की । सत्याणुयना से धनदेव सेंट ने पूजातिशय को प्राप्त किया था। चौयविरति अगुव्रत से वारिप्रेरण ने पूजा का अतिशय प्राप्त किया था। अन्नह्माविरति अणुदत्तब्रह्म चणुिदत ले नीली नाम की वणिवपुत्री पूजातिशय को प्राप्त हुई । परिग्रह विति अणुव्रत से जयकुमार पूजातिशय को प्राप्त हुआ था।
प्रश्न :--हिंसादि यांच पापों को करने से किसको क्या फल मिला ?... ..
उत्तर:- धनश्री और सत्य घोंप, तापस और कोतवाल और श्यचनवदीत ये पांच क्रम से हिसादि पापों में उपाख्यान करने के योग्य हैं।..
धनश्रीसत्यघोषौ च तापसारक्षकावपि । उपाख्येयास्तथा श्माशु नवनीतो यथाक्रमम् ॥१५॥
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