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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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क्रम - बस्तु तथा बर्तनों के प्रमाण का जनता में पांच परिह परिमाणाणअत के अतिचार हैं । क्षेत्र बास्तु श्रादि के प्रमाग उल्लङ्घन करने का प्रकार ऐसा है:- जैसे किसी ने नियम लिया कि मैं एक खेत और एक मकान रख गा.। बाद में पास के खेत और मकान को खरीदकर बीच की सीमा तोड़ दी तथा दोनों को एक कर लिया । यहाँ संख्या तो एक खेत या एक मकान की कर ली, परन्तु उसके प्रमाण में विस्तार कर लिया। इस स्थिति में भंगाभंग की अपेक्षा यह अतिचार बनता है। इसी प्रकार सोना-चांदी के विषय में किसी ने नियम किया कि मैं गले का एक, हाथ के दो और पैर का एक प्राभूषण रक्खगा। पीछे लोभ सताने में उसने उन ग्राभूपरणों में और भी सोना-चाँदी मिलवाकर फिर से प्राभूषण वनवा लिया । यहाँ । .. आभूषणो की संख्या तो पहले की तरह रही, परन्तु उनके परिमाण में वृद्धि हो गई। इस तरह भंगाभंग की अपेक्षा ग्रह अतिचार बनता है। इसी प्रकार अन्य अतिवारों के विषय में लगा लेना चाहिये।
इस मत की रक्षा के लिये उमास्वामी महाराज ने निम्नलिखित पांच भावनाएँ लिखी हैं 'मनोजामनोजेन्द्रिय विषय रागद्वप वर्जनानि पञ्च' स्पर्शनादि पाँच 'इन्द्रियों के मनोज और अमनोज विषय में रागद्वाप नहीं करना परिग्रह त्यागनत की। पांच भावनाग हैं।
प्रश्न :--अतिचारों से रहित अणुवतों को पालने से क्या फल मिलता है ?
उत्तर :--अतिचार रहित पांच अणुअत रूपी निधियाँ उस स्वर्ग लोक को .. फलती हैं-फल देती हैं, जिसमें अवधिज्ञान, अणिमा, महिमा आदि पाठ. गुण और सात धातुनों से रहित वैकिधिक शरीर प्राप्त होते हैं।
पञ्चाणवतनिधयो निरतिक्रमणाः फलन्ति सुरलोकम् । यत्राधिरष्टगुणा दिव्य शरीरं च लभ्यन्ते ।।४।।
अतिचार रहित पांच अणुयत निधियों के समान है । इनका निरतिचार पालन करने से नियम पूर्वक स्वर्ग की प्राप्ति होती है और उस स्वर्ग को जहाँ कि । ... अवविन्नान-भवप्रत्यय नाम का अवधिज्ञान नियम से प्राप्त होता है । अणिमा, - महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और. वशित्व ये पाठ ऋद्धियाँ तथा बातु, उपधातु से रहित परम सुन्दर वैकियक शरीर प्राप्त होता है।
- विशेषार्थ :--अणुव्रत धारण करने वाले जीव बद्धायुष्क और अबद्धारक
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