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________________ M E M .. ... . .. . .. यध्याय : पांचवां ] [ १२१ PORAN । निश्चित किये जाते हैं । श्लोक में आया हुया 'च' शटद'अपि' प्रार्थ में प्रयुक्त हुआ है। के अतिचार इस प्रकार है- अनिवार- लोली तीन को कम करने के लिये. परिग्रह का परिमारा कर लेने पर भी कोई लोभ के आवेश से अधिक वाहन रखता है, अर्थात् बैल आदि पशु जितने मार्ग को सुख से पार कर सकते हैं, उसे अधिक मार्ग पर उन्हें चलाता है, तो उसको यह क्रिया अति वाहन कहलाती है। इस नत के धारी किसी मनुष्य ने बैल अादि की संख्या तो कम कर ली, परन्तु उनको संख्या के अनुपात से खेती तथा मार्ग का यातायात कम नहीं किया, इसलिये उन कम किये हुए बैल आदि को ही अंधिक चलाकर अपना काम पूरा करता है। ऐसी स्थिति में अतिवाहन नाम का अतिचार होता है।.... ..... .: . अतिसंग्रह---'यह बान्यादिक आगे चलकर अधिक लाभ देंगा' इस लोभ के चश से कोई उसका अत्यधिक संग्रह करता है। उसका यह कार्य अतिसंग्रह नाम का अतिचार है । अतिविस्मय संगृहीत वस्तु की वर्तमान भाव से बेच देने पर किसी का... मूल भी वसूल नहीं हुआ और दुसरे के द्वारा ठहकर वेचने पर उसे अधिक लाभ हुआ, इस स्थिति में लोक्ष के प्रावेश से अतिविस्मय अति .. खेद करता है । अतिविस्मय नाम का अतिलो - विशिष्ट. लोभ मिलने पर भी और भी अधिक लाभ की इच्छा से कोई अधिक लोभ करता है, तो उसका वह अतिलोभ नाम का अतिचार है । अतिभारारोपण---लोभ के आवेश से अधिक भार लादना.. अतिभारारोपण नाम का अतिचार है। एक अतिभारारोपण अतिचार अहिंसाणुअत का भी है, परन्तु वहां कष्ट देने का भाव रहता है और यहां अधिक लाभ प्राप्त करने का - अथवा अतिभारारोपण का एक अर्थ. यह भी हो सकता है कि अपने कारोबार को इतना अधिक फैला लेना, जिसकी वह स्वयं संभाल नहीं कर सकता और उसके कारण उसे सदा व्यग्र रहना पड़ता है ! ... .. .. . .. ... ... .. ... ...... ... विशेषार्थ : --- तत्वार्थ सूत्रकार ने परिग्रह परिमाणवत के अतिचार दूसरे ही लिखे हुए हैं । यथा - 'क्षेत्र वास्तु हिरण्य सुवर्णधनधान्य. दासी दास कुप्य प्रमागातिक्रम:' अर्थात क्षेत्र वास्तु प्रभागातिकम-खेत और मकान के प्रमाण का उल्लङ्कन करना, हिरण्य सुवर्ण प्रमाणातिक्रम-सोना, चाँदी आदि प्रमाण का उल्लङ्घन करना, बनधान्य प्रमाणातिक्रम- पशुधन तथा अनाज के प्रमाण का उल्लङ्घन करना, दासीदास प्रमाणातिक्रम् -द्रास-दासियों के प्रमाण का उल्लङ्घन करना, कुप्यप्रमागाति A
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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