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________________ १२० ] । गो. प्र. चिन्तामणि परिग्रह का परिणाम किया जाता है, इसका दूसरा नाम इच्छा परिमाण भी है। - विशेषार्थ :--'परितः गृह्णाति आत्मानमिति परिग्रहः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो आत्मा के सब ओर से जकड़ ले, उसे परिग्रह कहती हैं। परिग्रह का। वाच्यार्थ मूर्छा है । जैसे कि तत्त्वार्थ सूत्र में कहा है----'मूर्छा परिग्रहः अर्थात् पर पदार्थों में जो मुच् ममत्वभाव, वही परिग्रह कहलाता है । यह परिग्रह अन्तरंग और बहिरंग के भेद से दो प्रकार का होता है। अन्तरंग परिग्रह मिथ्यात्व, क्रोध मान, माया, लोभ तथा हास्यादि नौ नोकथायः के भेद से १४ प्रकार का होता है। और वहिरंग परिग्रह चेतन, अचेतन के भेद से दो प्रकार का होता हैं । दासी-दासः ग्रादि द्विपद मीर गाय-स आदि चतुष्पद चेतनपरिग्रह और खेत, मकान, सोना, चाँदी । श्रादि अचेतन परिग्रह है । मबं मिलाकर क्षेत्र, वास्तु, धन, धान्य, द्विपद. चतुप्पदा । शयनासन, यान, कुप और भाण्ड के भेद से बहिरंग परिकह वश प्रकार का माना गया हैं। परिग्रह त्याग महाव्रत में इन सभी परिग्रहों का त्याग रहता है । परन्तु गृहस्थ । परिग्रहं का पूर्ण त्याग नहीं कर सकता । वह अपनी आवश्यकता के अनुसार उसकी । सीमा निश्चित कर सकता है। इसलिये गहस्थों के लिये परिग्रह परिमागा अगानत. बार करने का उपदेश दिया गया है। गृहस्थ की आवश्यकता भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं। किसी का परिवार थोड़ा है, अत: उसका काम थोडे परिग्रह से चल सकता है और किसी का परिवार बड़ा होता है, अतः उसे अधिक परिग्रह रखना पड़ता। है । इसलिए प्राचार्यों ने परिग्रह परिमारण्यत को इच्छा परिमाग भी नाम दिया है। अर्थात् इसमें अपनी इच्छा के अनुसार परिग्रह का परिमाण किया जाता है । परिमार, किये हुये परिग्रह से अधिक परिग्रह में किसी प्रकार की वांछा नहीं रखना; इस अत । की विशेषता है। प्रश्न :----परिग्रह परिमाणवत के अतिचारों का क्या स्वरूप है ? . उत्तर :---अतिवाहन, अतिसंग्रह, अतिविस्मया, अतिलोभ और अतिभार वाहन ये पाँच परिग्रह परिमाण अणुअत के अतिचार निषित्रत किये जाते हैं। अतिवाहनातिसंग्रह विस्मय लोभाति भारवहनानि । : .. परिमित परिग्रहस्य च विक्षेपाः पञ्च.. लक्ष्यन्ते ॥४॥ ... : - विक्षेप का अर्थ अतिचार है । जिस प्रकार अहिंसादि अणवतों के पांच-पांच ।। अनिचार बतलाये गये हैं, उसी प्रकार परिग्रह परिमांगगाणुव्रत के भी पांच अतिचार ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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