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________________ .:.... . MIST RELArtery PHAS ... ...... अध्याय : पांचवां । [ . ११६ बिटत्व है । विपुलतृषा --- काम सेवन की तीन प्रासक्ति को विपुलतृपा कहते हैं। इत्वरिकागमन - व्यभिचारिणी स्त्री को इत्वरिका कहते हैं । ऐसी स्त्रियों के साथ उठना-बैठना तथा व्यापारिक सम्पर्क बढ़ाना इत्वरिकागमन है। - विशेषार्थ :-तत्वार्थ सूत्रकार ने ब्रह्मचर्याणवत के निम्नांकितः पाँच अतिचार कहे हैं- 'पर विवाह करणेत्वरिका परिगृहीतापरिगृहीतागमनानङ्गक्रीड़ा. कामतीत्राभिनिवेशाः' अर्थात् १. परविवाह करण, २. परिगृहीतेत्वरिका गमन, ३. अपरिगृहीतेत्वरिकागमन, . ४. अनंगक्रीडा. और ५. कामतीमाभिनिवेश ये पांच ब्रह्मचर्याणुव्रत के अतिचार हैं । समन्तभद्र स्वामी ने 'परिंगृहीतत्वरिकागमन' और . 'अपरिगहोतेत्वरिकागमन' इन दो अतिचारों को एक इत्वरिकागमन में सम्मिलित कर विटत्व का अलग से समावेश किया है। ब्रह्मचर्याणुव्रत की रक्षा के लिये तत्त्वार्थसुत्रकार ने निम्नलिखित पाँच भावनाओं .. का उल्लेख किया है... . .. . 'स्त्रीरागकथा श्रवणतन्मनोहसँग निरीक्षणा पूर्वरतानुस्मरण वृष्येष्टरंस स्वशरीर संस्कार त्यागाः पञ्च' अर्थात् स्त्रियों में राग बढ़ाने वाली कथानों के सुनने का त्याग करना, उनके मनोहर अंगों के देखने का त्याग करना, पहले भोगे हुए भोगों के स्मरण का त्याग करना, गरिष्ट एवं कामोत्तेजक पदार्थों के सेवन का त्याग करना पीर अपने शरीर की सजावट का त्याग करना इन भावनाओं से ब्रह्मचर्यव्रत सुरक्षित . रहता है। प्रश्न :-~परिग्रहविरति अणुव्रत का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-धनधान्य आदि परिग्रह का परिमागाकर उससे अधिक में इच्छारहित होना परिमित परिग्रह अथवा इच्छापरिणाम नाम का अणुक्त कहलाता है । धनधान्यादिग्रन्थं परिमाय ततोऽधिकेषु निः स्पृहता । .. परिमित परिग्रहः स्यादिच्छा परिमारा नामापि ॥१५॥४७॥ . ___ गाय भैस आदि को धन कहते हैं। धान्य, गेहूं, चना आदि को वन्य कहते हैं । आदि शब्द से दासी-दास, स्त्री-मकान, खेत, नगद-द्रव्य, सोना-चाँदी के आभूषण तथा वस्त्र आदि का संग्रह होता है । यही सब परिग्रह कहलाता है । अपनी इच्छानुसार र देव अथवा गुरु के पादमूल में इसका परिमाणकर उससे अधिक में इच्छारहित होना परिमित परिग्रह नाम का अणुवत होता है । इस अणुवत में अपनी इच्छा के अनुसार 66 र ME
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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