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[ गो. प्र. चिन्तामणि और अपरग्रहीत के भेद से दो प्रकार की होती हैं। जो दूसरे के द्वारा विवाहित हैं, वे परिगृहीत कहलाती हैं, और जो अविवाहित हैं, अथवा. वेश्या आदि के समान जो उन्मुक्त-स्वच्छन्द हैं, में परिग्रहीत हैं. जागा दशकारी पुरुष स्वस्त्री को
छोड़कर अन्य दोनों प्रकार की परस्त्रियों से दूर रहता है। उसका यह दूर रहना पापः । 'के भय से होता है, राजा आदि के भय से नहीं, क्योंकि अभिप्रायपूर्वक पाप से निवृत्ति होने को हो वृत कहते हैं, अशक्ति अथवा किसी अन्य भय से निवृति होने को श्रत नहीं
कहते हैं । प्राचार्य ने ब्रह्मचरण प्रत के लिए परंदार निवृत्ति और स्वदार संतोष इन :: : दो नामों का प्रयोग किया है, उससे यह भाव ध्वनित होता है कि ब्रह्मचर्याण अतः ।
का धारक पुरुष देश-काल के अनुसार अपनी अनेक स्त्रियां हों तो उनका समागम कर सकता है, पर स्त्रियों का नहीं । वह अपनी स्त्रियों में उसकी विकार पूर्ण दृष्टि नहीं होती। . . . . . . .
. प्रश्न :-ब्रह्मचर्याणुव्रत के प्रति चारों का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-अन्य विवाहकरंग, अनङ्ग क्रीडा, बिटत्व, विपुल तृपश और :... इत्वरिका गमन ये पाँच ब्रह्मचर्याणां व्रत के अतिचार हैं ।
अन्य विवाहाकरमानङ्ग क्रीडा विटत्व विपुलतृषः । .इत्वरिका गमनं चास्मरस्य पञ्च व्यतिचारा: ॥४६॥ :
__अ-ईषत् स्मरः कामा यस्य स स्मर: तस्य. इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिसके स्वस्त्रीविषयक थोड़ा राग रहता है. उसे अस्मर अथवा ब्रह्मचर्यागा प्रती कहते हैं, इस व्रत के धारक पुरुष को निम्नाङ्कित पांच अतिचारों का परित्याग करना चाहिये-अन्यविवाहकरण-कन्यादान को विवाह कहते हैं। अपनी या अपने प्राश्रित भाई आदि की संतान को छोड़कर अन्य लोगों की संतान अन्य संतान हैं। उन अन्य . संतानों का विवाह प्रमुख बनाकर करना अन्यविवाहकरण है । 'अन्य विवाहस्य प्रा. समन्तात् करणं अन्य विवाहकरणम्' इस व्युत्पत्ति से यह भाव प्रगट होता है, कि जो पटिया बनाकर दूसरों का विवाह सम्बन्ध जुटाते रहते हैं. उनके उस कार्य के प्रति ही प्राचार्य का संकेत है। सहधर्मी भाई के नाते उनके पुत्र-पुत्रियों के विवाह में
संमिलित होना ब्रह्मचर्यारण वृत्ती के लिये निषिद्ध नहीं है। अनंगक्रीडा-काम सेवनः ... के लिये निश्चित अंगों के अतिरिक्त अन्य अंगों में क्रीडा करना अनंगक्रीडा है। .. बिटस्व-शरीर से कुचेष्टा करना. और मुख से अश्लील. भद्दे वचनों का प्रयोग करना
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