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________________ जन स KIRATRAI अध्याय : पांचवां ] [ ११७ स्वामी ने विरुद्ध राज्यातिकाम के बदले बिलोप शब्द रखा है, जिसका अर्थ राजकीय कानून का उल्लंघन करना होता है । विरुद्ध राज्यातिकम भी इसी में गतार्थ हो जाता है । . HOUSE ... अचार्य व्रत की रक्षा के लिए तत्वार्थ सुकार ने निम्नलिखित पांच भावनाओं .. का वर्णन किया है... 'शून्यागार विमोचिताबास परोपरोधाकरण भक्ष्य गुद्धि सद्धर्मा विसंवादाः । पञ्च'अथात् शून्यागारावास-पर्वत की गुफाओं तथा वक्ष की कोटरों आदि प्राकृतिक शून्य स्थानों में निवास करना, विमोचितावास-राजा आदि के द्वारा छुड़वाए हुए-उजड़े ग्रहों में निवास करना; परोपरोधाकरणा-अपने स्थान पर दूसरे के ठहर जाने पर . सवावट नहीं करना, भैक्ष्य शुद्धि-चरगानयोग की पद्धति से भिक्षा की सृद्धि रखना और सद्धर्माविसंवाद---मह धर्मीजनों के साथ उपकरण यादि प्रसंग को लेकर विसंवाद नहीं करना, इन पांच का अन्मायन की रक्षा होती है । मुनि इन भावनाओं का साक्षात्-प्रवृतिहण और गृहस्थ भावना रूप से पालन करते हैं। प्रश्न :--ब्रह्मचर्याणवत का क्या स्वरूप है ? उत्तर :---जो पाप के भय से परस्त्रियों के प्रति न स्वयं गमन करता है, और न दूसरों को गमन कराता है, वह परस्त्रीत्याग अथवा स्वदार संतोप नाम का अरण यत है। न तु परदारान् गच्छति न परान् गमयति च पापभीतेर्थत् ।। __ सा परदारनिवृत्तिः । स्वदार सन्तोषनामापि ॥४५॥ श्लोक में आये हुए 'परदारान्' शब्द का समास दो प्रकार का होता है...... १. 'परस्य दाराः परदारास्तान अर्थात् पर स्त्रियां । इसमें पहले समास से पर के द्वारा परिगृहीत्त स्त्रियों का बोध होता है और दूसरे समास से पर के द्वारा अपरिगृहीत अविवाहित कन्याओं अथवा वेश्याओं का ग्रहण होता है । इस प्रकार इन परिगृहीत अपरिगृहीत-दोनों प्रकार की परस्त्रियों के साथ पाप के भय से न कि राजकीय और सामाजिका भय से, न स्वयं संगम करना और न परस्त्रिलम्पट अन्य पुरुषों को गमन कराना परस्त्रीत्याग अगं व्रत हैं । इसी को स्वदार संतोषनत भी कहते हैं। .::... - विशेषार्थ-जिसके साथ धर्मानुकूल विवाह हुया है, उसे स्वस्त्री कहते हैं, और इसके सिवाय जो अन्य स्त्रियां हैं, वे परस्त्रियां कहलाती हैं। परस्त्रियां परिगृहीत EिR
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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