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अध्याय : पांचवां ]
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स्वामी ने विरुद्ध राज्यातिकाम के बदले बिलोप शब्द रखा है, जिसका अर्थ राजकीय कानून का उल्लंघन करना होता है । विरुद्ध राज्यातिकम भी इसी में गतार्थ हो
जाता है । .
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... अचार्य व्रत की रक्षा के लिए तत्वार्थ सुकार ने निम्नलिखित पांच भावनाओं .. का वर्णन किया है... 'शून्यागार विमोचिताबास परोपरोधाकरण भक्ष्य गुद्धि सद्धर्मा विसंवादाः । पञ्च'अथात् शून्यागारावास-पर्वत की गुफाओं तथा वक्ष की कोटरों आदि प्राकृतिक शून्य स्थानों में निवास करना, विमोचितावास-राजा आदि के द्वारा छुड़वाए हुए-उजड़े ग्रहों में निवास करना; परोपरोधाकरणा-अपने स्थान पर दूसरे के ठहर जाने पर . सवावट नहीं करना, भैक्ष्य शुद्धि-चरगानयोग की पद्धति से भिक्षा की सृद्धि रखना और सद्धर्माविसंवाद---मह धर्मीजनों के साथ उपकरण यादि प्रसंग को लेकर विसंवाद नहीं करना, इन पांच का अन्मायन की रक्षा होती है । मुनि इन भावनाओं का साक्षात्-प्रवृतिहण और गृहस्थ भावना रूप से पालन करते हैं।
प्रश्न :--ब्रह्मचर्याणवत का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :---जो पाप के भय से परस्त्रियों के प्रति न स्वयं गमन करता है, और न दूसरों को गमन कराता है, वह परस्त्रीत्याग अथवा स्वदार संतोप नाम का अरण यत है।
न तु परदारान् गच्छति न परान् गमयति च पापभीतेर्थत् ।। __ सा परदारनिवृत्तिः । स्वदार सन्तोषनामापि ॥४५॥
श्लोक में आये हुए 'परदारान्' शब्द का समास दो प्रकार का होता है...... १. 'परस्य दाराः परदारास्तान अर्थात् पर स्त्रियां । इसमें पहले समास से पर के द्वारा परिगृहीत्त स्त्रियों का बोध होता है और दूसरे समास से पर के द्वारा अपरिगृहीत अविवाहित कन्याओं अथवा वेश्याओं का ग्रहण होता है । इस प्रकार इन परिगृहीत अपरिगृहीत-दोनों प्रकार की परस्त्रियों के साथ पाप के भय से न कि राजकीय और सामाजिका भय से, न स्वयं संगम करना और न परस्त्रिलम्पट अन्य पुरुषों को गमन कराना परस्त्रीत्याग अगं व्रत हैं । इसी को स्वदार संतोषनत भी कहते हैं। .::...
- विशेषार्थ-जिसके साथ धर्मानुकूल विवाह हुया है, उसे स्वस्त्री कहते हैं, और इसके सिवाय जो अन्य स्त्रियां हैं, वे परस्त्रियां कहलाती हैं। परस्त्रियां परिगृहीत
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