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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि चीरादान — जिसे अपने द्वारा प्रेरणा नहीं दी गई है तथा जिसकी अनुमोदेना नहीं की गई है, ऐसे चोर के द्वारा चुराकर लाई हुई वस्तु को ग्रहण करना चौदान है । चोरी का माल खरीदने से चोर को चोरी की प्रेरणा मिलती है । ११६ ] विलोप उचित न्याय को छोड़कर अन्य प्रकार से पदार्थ का ग्रहण करना विलोप कहलाता है । इसे ही विरुद्ध राज्यातिक्रम कहते हैं। जिस राज्य के साथ अपने राज्य का व्यापारिक सम्बन्ध निषिद्ध है अर्थात् जिस राज्य में अपने राज्य की वस्तुयों का जाना-जाना राज्य की ओर से निषिद्ध किया गया है, उसे विरुद्ध राज्यातिक्रम कहते हैं | विरुद्ध राज्य में महंगी वस्तुएँ स्वल्प मूल्य में मिलती हैं, ऐसा मानकर वहाँ स्वल्पमूल्य में वस्तुओं को खरीदना और तस्कर व्यापार के द्वारा अपने राज्य में लाकर अधिक मूल्य में बेचना विरुद्ध राज्यातिक्रम कहलाता है । सदृशसन्मित्र - समान रूप-र वाली नकली वस्तु श्रमन्त्री वस्तु में मिलाकर असली वस्तु के भाव से बेचना जैसे वी को तेल यादि से मिश्रित करना अथवा कृत्रिम - बनावटी - नकली सोना-चांदी के द्वारा धोखा देते हुए व्यापार करना 'सदृशसन्मित्र कहलाता है । हीनाधिक विनिमान -- जिनसे वस्तुओं का विनिमान - आदान-प्रदान लेन-देन होता है, उन्हें विनिमान कहते हैं । इन्हीं को मानोन्मान भी कहते हैं । जिसमें भरकर या जिससे तौलकर कोई वस्तु ली या दी जाती है, उसे मान कहते है, जैसे प्रस्थ तराजू यादि। और जिससे नापकर कोई वस्तु ली या दी जाती है, उसे उन्मान कहते हैं, जैसे फुट, गज यादि । किसी वस्तु को देते समय होन मान उत्मान का और खरीदते समय अधिक गान उन्मान का प्रयोग होनाधिक मानोन्मान कहलाता है वृत का भारी मनुष्य इन सब प्रतिचारों से दूर रहकर अपने वृत को सुरक्षित रखता है । विशेषार्थ -- तत्वार्थ सूत्रकार ने भी अचर्यारण बूत के ये ही प्रतिचार निरूपित किये हैं । जैसे 'स्तेन प्रयोग तदाहृतादान विरुद्ध राज्यातिक्रम हीनाधिक मानोत्सान प्रति: रूपक व्यवहाराः' अर्थात् स्तेन प्रयोग, तदाहृतादान, विरुद्ध राज्यातिक्रम, हीनाधिक गानोन्मान और प्रतिरूपक व्यवहार ये पांच चार वृत के प्रतिचार हैं । समन्तभद्रः
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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