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अध्याय : पांचवां ] 'निहित' धन की चोरी है । किसी के खरीदे हुए मकान में यदि कोई धन मिलता है, तो अचौर्याणुव्रत का धारी मनुष्य उस मकान मालिक को वापिस करता है। यदि किसी पुराने खण्डहर आदि में धन मिलता है, और उसके असली स्वामी का पता नहीं चलता है तो इस स्थिति में अचौर्याणुव्रत का धारक मनुष्य इसकी सूचना राज्य में . देता है। बयोंकि. 'अस्वामिकस्य वित्तस्य दायादो मेदिनीपतिः' अर्थात् जिसका कोई स्वामी नहीं से धन का स्वामी राजा होता है. 1 मार्ग में चलते समय किसी की कोई : ... यस्तु गिर जाती है, उसे पतित कहते हैं । अचौर्यारण वृत का धारक मनुष्य ऐसे धन को न स्वयं उठाता है, और न उठाकर दूसरे को देता हैं। यदि मन में यह विकल्प प्राता है कि इस पड़ी हुई वस्तु को मैं नहीं उठाता हूँ, तो न जाने मेरे पीछे पाने वाले किसले हार में पड़ेगी और शिया वस्तु वे मालिक को इसका मिल जाना असंभव : हो जावेगा, तो उस वस्तु को उठाकर किसी राजकीय कार्यालय में जमा करा देना चाहिये और उसकी सूचना प्रसारित करा देना चाहिये । कोई मनुष्य अपने पास बसे-.. हर के रूप में कुछ धन रख गया, पीछे भूल गया अथवा रखने वाले व्यक्ति की .... अकस्मात् मृत्यु हो गई और उसके उत्तराधिकारी पुत्र आदि को उसकी खबर नहीं । इस स्थिति में उस धन को मांगने के लिये कोई नहीं पाता है, तो ऐसा धन सुविस्मृत. कहलाता है । प्राचौर्याा व्रत का धारक मनुष्य ऐसे धन को अपने पास नहीं रखता। वह उसके उत्तराधिकारी को स्वयं ही वापिस करता है । अचौणि व्रत का धारक : मनुध्य प्रायकर, विक्रयकर तथा निगमकर आदि को नहीं चुराता तथा अपने भाईयों आदि के हिस्से को भी नहीं हड़पता ।
प्रश्न :-प्रचौर्याणवत के अतिचार कितने हैं और उनका क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-चौरप्रयोग, चोरार्थादान, विलोप, सदृशसन्मिश्र और हीनाधिक विनिभान ये पांच अचौर्यारण अंत के अतिचार हैं ।
चौरप्रयोग चौरार्थादान बिलोप सदृश सन्मिश्राः । हीनाधिक विनिमानं पञ्चास्तेये व्यतीपाताः ॥४४॥ अचौर्यारण वृत में निम्नाडिकत पांच अतिचार होते हैं---
चौर प्रयोग -चोरी करने वाले चोर के लिये स्वयं प्रेरणा देना, दसरे से प्रेरणा दिलाना और किसी ने प्रेरणा दी हो तो उसकी अनुमोदना चौर प्रयोग है.।
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इश सन्मिश्राः ।