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________________ ११४ ] [ गो. प्र. चिन्तामखि सत्यबूत की रक्षा के लिये तत्वार्थ सूत्रकार ने 'क्रोध लोभ भीरुत्य हास्य प्रत्याख्यानानुवीचिभाषणं पञ्च यर्थात् क्रोध त्याग, लोभ त्याग, भोरुत्व त्याग, हास्य त्याग और अनुयी चिभाषणानुकूल पातनायें बतलायी हैं । इनके होने पर ही सत्यबूत की रक्षा हो सकती है, अन्यथा नहीं । ग्रसत्य बोलने के दो प्रमुख कारण है- एक कषाय और दूसरा अज्ञान । कषाय निमित्तक असत्य से बचने के लिये कोध, लोभ, भय और हास्य का त्याग कराया है, क्योंकि ये चारों ही कपाय के रूप हैं । और ज्ञान मूलकं असत्य से बचने के लिये अनुवीचिभाषण--- प्राचार्य परम्परा से प्राप्त प्रांगमानुकूल वचन बोलने की भावना कराई है। इस भावना के लिये श्रागम का अभ्यास करना पड़ता है । श्रागम के अभ्यास से अज्ञानअसत्य दूर होता है । प्रश्न :- प्रचौर्याणुव्रत का क्या स्वरूप ? उत्तर :- - रखे हुए, पड़े हुए अथवा बिल्कुल भूले हुए बिना दिये हुए दूसरे के धन को जो न स्वयं लेता है और न किसी दूसरे को देता है, वह स्थूल स्तेय का परित्याग अर्थात् प्रचर्या बूत है । निहितं वा पतितं वा सुविस्मृतं वा परस्वमविसृष्टं । न हरति यत्र च दत्ते तदकुश चौय्र्यादुपारमरणम् ||४३|| प्रकृश चौर्य का अर्थ स्थूल चोरी है । अर्थात् लोक में जो चोरी के नाम से प्रसिद्ध है तथा जिसके लिये राजकीय और सामाजिक दण्ड व्यवस्था निश्चित है । इस 'स्थूल चोरी से उपारमा निवृत होना, सो प्रवृत है । प्रचार्याण व्रत का धारक पुरुष किसी के रखे हुए, पड़े हुए या भूले हुए धन को बिना दिये न स्वयं ग्रहण करता है और न उठाकर दूसरे को देता है । विशेषार्थ : -- तत्त्वार्थ सूत्रकार ने चोरी का लक्षण लिखते हुए 'प्रदत्तदान स्तेयम्' यह सूत्र लिखा है, जिसका अर्थ है प्रदत्त विना दी हुई वस्तु को ग्रहण करना चोरी है । स्वामी समन्तभद्र ने प्रदत्त शब्द को व्याख्या करते हुए उसके तीन रूप निर्धारित किये हैं-१ निहित २. पतित और ३ सुविस्मृतं । कोई मनुष्य अपने पास, किसी वस्तु को रख गया अथवा किसी के निज के मकान में कोई मकान बेचते समय उसे उस धन को निकालने का ध्यान नहीं रहा, नहीं रखा था। धन को लेना
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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