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________________ :: KAR.2312 अध्याय : पाँचवां ] [ ११३. विकार तथा भौहों का चलाना आदि के द्वारा दूसरे के अभिप्राय को जानकर ईष्या-. . वश उसे प्रकट कर देंना पैगून्य है । यहो साकार मन्त्र भेद कहलाता है। दूसरे के... द्वारा अनुक्त अथवा अकृत किसो कार्य के विषय में ऐसा कहला क्रि ग्रह उसने कहा है, अथवा किया है, इस प्रकार धोखा देने के अभिप्राय से कपट पूर्ण लेख लिखना कुट लख करंगा है। मथा धरोहर रखने वाला पुरुष अपनी धरोहर की संख्या भूलकर अल्पसंख्यक द्रव्य को भांग रहा है, तो उससे कहना कि हाँ, ऐसा ही है, इसे न्यासापहारिता कहते हैं, इस प्रकार परिवादादिक बार और पांचवीं न्यासापहारिता, सब .. मिलाकर सत्यागा अत के पाँच अतिचार कहे हैं। . . विशेपार्थ----उमा स्वामी महाराज ने तत्त्वार्थ सुत्र में सत्याप वृत के अतिचार निम्न प्रकार कहे हैं :-- . मिथ्योपदेश रहोभ्याख्यान कट लेख क्रिया यासापहारितासाकारमन्त्रभेदाश्त्र अर्थात मिथ्योपदेश, रहोभ्याख्यान, क्लेख किया, न्यासापहारित और साकार मन्त्र भे ये पाँच सत्यागायत के अतिचार हैं । समन्तभ्रद स्वामी ने अलिंचार निरूपण में . उमास्वामी महाराज का अनुकरण तो किया है, परन्तु कितने ही अतिचारों में उन्होंने : .... परिवर्तन भी किया है । जैसे इसी सत्यागा उत्त के अतिचारों में परिवाद और पैशुन्य इन दो नवीन अतिचारों का समावेश किया है और मिथ्योपदेश तथा साकारमन्त्र भेद ... को छोड़ा है । लोक में परिवाद का अर्थ निन्द्रा और पैशुन्य का अर्थ तुगली प्रसिद्ध है। संभव है यही अर्थ स्वामी समन्तभद्र को वाञ्छित रहा होगा । परन्तु संस्कृत टीका कार में तत्वार्थ सूत्र के अतिचारों से मेल बैठाने के लिये परिवाद का अर्थ मिथ्योपदेश : मोर पैशुन्य का अर्थ साकारमन्ध भेद कर दिया है जो कि शब्दों से प्रतिफलित नहीं होता ! समन्तभद्र स्वामी परम विचारक विद्वान थे, इसलिये उन्होने अतिचारों में तो परिवर्तन किया ही है, गुणवृत और शिक्षावृतों के नामों में भी परिवर्तन किया है । जैसे तत्त्वार्थ सूत्रकार ने दिग्बूत, देशवत और अनर्थदण्डवत इन तीनों को गुगाबूत तथा ... मामाथिक, प्रेपरोपवास, भोगोपभोग परिमाणा और अतिथिसंविभाग इन चार को शिक्षाक्त माना है । परन्तु समन्त भद्र स्वामी ने दिग्दत, अनर्थदण्डवत और भोगोषभोप परिमारणवत इन तीन को गुणवतु तथा देशावकाशिक, सामायिक, प्रोषधोपवास और बयावृत्य कहा है । कुन्द कुन्द स्वामी ने सल्लेखना का चार शिक्षावृतों में समावेश किया है। परन्त तत्वार्थ सुत्रकार तथा स्वामी समन्तभद्र आदि ने इसका पृथक ही - वर्णन किया है ... . ........ । .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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