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________________ 55433 ११२ ] [ गो. प्र. चिन्तामगि सत्याणुव्रती ऐसा भी सत्य नहीं बोलता है, जो प्राण घात करने वाला हो । जैसे। कोई शिकारी अपनी मद्री में जिन्दा चिड़िया की गर्दन दबाकर एक सत्यवादी से पछता है कि बतायो यह जिन्दा है या मरो ? सत्यवादी विचार करता है कि यदि मैं इसे जिन्दा कहता हूं तो अभी हाल यह गर्दन को दबाकर इसे मार डालेगा। पीर मरी कहता हूं तो इसे छोड़कर कहेगा कि देखो, यह तो जिन्दा है तुम कैसे सत्यवादी हो ? ऐसा विचारकर सत्यवादी ने उत्तर दिया कि 'यह चिड़िया मरी है ।' शिकारी ने तत्काल चिड़िया को मुट्ठी से छोड़कर कहा कि तुम कैसे सत्यवादी हो ? यहाँ जीव रक्षा का भाव होने से असत्यवचन भी सत्य वचन के रूप में परिगात हो गया है । विचारगीय प्रश्न यह है कि सत्यवादी के सामने एक कातिल ने एक निरपराध व्यक्ति की हत्या कर दी । हत्या के अपराध में वह पकड़ा गया । गवाही के लिए उस सत्यवादी को बुलाया गया । यदि सत्यवादी सत्य कहता है तो कातिल को प्राणदगड की सजा मिलती है और असत्य कहता है तो वह छूट तो जाता है, पर उससे अन्याय का समर्थन होता है, जिसके फलस्वरूप उस कातिल के द्वारा अन्य अनेक जीवों की भी हिंसा हो सकती है । इस स्थिति में सत्यवादी सत्य बोले या असत्य ? . उस समय परिस्थिति के अनुसार सत्यवादी तीन कार्य कर सकता है। प्रथम . तो वह इस प्रकार की गवाही के चक्र में न पड़े । द्वितीय यह कि यदि वह कातिल अपने पाप से घृणा करने लगता है और भागामी समय के लिए वैसा अपराध न करें। और तृतीय यह है कि अन्य अनेक जीवों की रक्षा के अभिप्राय से वह सत्य बोले, क्योंकि संसार में अराजकता फैले तथा उसके फलस्वरूप अनेक जीवों की हत्या हो ग्रह एक जीव के प्राण-घात की अपेक्षा अधिक पाप है। प्रश्न : सत्याणुवत के अतिचार कौनसे हैं और उनका क्या स्वरूप है ? . उत्तर :-मिश्योपदेश, रहोभ्याख्यान, पैशून्य, कूटलेख लिखना और धरोहर को हड़प करने के वचन कहना - ये पांच सत्याणुन्नत के अतिचार हैं । परिवाद रहोभ्याख्यापैशुन्यं कूटलेख करणं च । . त्यासापहारितापि च व्यत्तिकमाः पञ्च सत्यस्य ॥४२॥ ... - परिवाद का अर्थ मिश्योपदेश है अर्थात् अभ्युदय और मोक्ष प्रयोजन वाली किया विशेषों में दूसरे को अन्यथा प्रवृत्ति कराना परिवाद या मिथ्योपदेश है । स्त्री· पुरुषों द्वारा एकान्त में की हुई विशिष्ट क्रिया को प्रगट करना रहोभ्याख्यान है । अंग 2017
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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