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अध्याय : पांचवां ] भैस ग्रादि को रखता नहीं है । मध्यम यह है कि यदि रखता है, तो किसी नहाते में उन्हें बिना बन्धन के रखता है । जघन्य यह कि ऐसा बन्धन देता है, जिसे वे उपसर्ग के समय तोड़कर अपनी प्राण रक्षा कर सकें।
प्रश्न :--सत्याणुव्रत का क्या स्वरूप है ? . उत्तर :--जो स्थूल झूठ को न स्वयं बोलता है, न दूसरों से बुलवाता है, और ऐसा सत्य भी न बोलता है, न दूसरे से बुलवाता है, जो दूसरे के प्राण-घात के लिये हो उसे सत्पुरुप स्थूल झूठ का त्याग अर्थात सत्याणुव्रत कहते हैं ।
उमास्वामी महाराज ने असत्य अत का लक्षण लिखा हैअसदभिधानमनूतम् ॥४१॥
इसका व्याख्यान चार प्रकार से होता है-१. न सत् इति असत् विद्य मानमित्यर्थः तस्य अभिधानं कथनमिति असदभिधानम् अर्थात् अविद्यमान पदार्थ का कथन करना, जैसे देवदत्त के न रहने पर भी कहना कि देवदत्त है । यह असदुद्भावन अविद्यमान को प्रगट करने वाला पहला असत्य हैं। २ 'सतो विद्यमानस्य अभिधानं सदभिधान न सदभिधान मिति असदभिधानम्' अर्थात् विद्यमान पदार्थ का कथन नहीं करना, जैसे देवदत्त के रहते हुए भी कहना कि देवदत्त नहीं है । यह सदपलाप-विद्यमान वस्तु को मेटने वाला दुसरा असत्य है ।
३-'ईवत् सत् असत् तस्य अभिधानं असदभिधानम् ।'
यहाँ असत् शब्द के साथ जो नञ् का प्रयोग हुवा है, वह 'अनुदरा कन्या' के समान ईषद् अर्थ में हुअा है अर्थात् जो पदार्थ जिस रूप में कहा गया है, उस रूप में तो नहीं है, परन्तु उसका कार्य सिद्ध कर देता है, इसलिये उसके समान कहा जाता है। जैसे कमण्डलु को घट कहना । यहाँ कमण्डलुः जुदा है और घट जुदा है, इसलिये प्राकार की अपेक्षा कमण्डल को घट कहना मिथ्या है, परन्तु जल धारणरूप' कार्य दोनों का एक सदृश है, इसलिये उक्त वायय ईषद् सत् के कथन में आता है । यह अन्यरूपाभिधान-अन्य को अन्य रूप कहना तीसरा . असत्य है । ४. 'सत् प्रशस्तं न सत् असत् अप्रशस्तं असच्च तत् अभिधानं चेति असदभिधानम्' अर्थात् अप्रशस्त वचन बोलना । जैसे काने को काना, लंगड़े को लंगड़ा आदि कहना, निन्दा तथा चुगली के वचन कहना तथा अप्रिय एवं कर्कश वचन कहना, यह गहितादिवचन नाम का चौथा असत्य है । इन चारों प्रकार के असत्य बचनों का परित्याग करना सत्याणुव्रत है ।