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[ गो. प्र. चिन्तामणि
आलोकित पान भोजन - भोजन पान ग्रहणं करते समय देखने और शोधने का ध्यान रखना |
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प्रश्न:-हात के परिवार हैं और उनका क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- - हिसारण बूत के छेदना, बाधना, पीड़ा देना, अधिक भार लादना,. और ग्राहार पानी का रोकना अथवा ग्राहार बचाकर रखना ये पांच प्रतिचार हैं ।
छेदन बन्धन पोडन मति भाररोपरां व्यतीचाराः ।
आहार वारणापि च स्थूलं बधाद् व्युपरितः पञ्च ॥ ४० ॥
प्रतिचारोंऽ भञ्जनम् । इस लक्षण के अनुसार अतिचार का अर्थ होता है, वृत का एक देशभङ होना । ऊपर ग्रहिसाबूत का लक्षण लिखते हुए, मन, वचन, काय और कृतं कारित, अनुमोदन इन नौ कोटियों का उल्लेख किया गया है, अर्थात उपर्युक्त नौ कोटियों से व्रत की पूर्णता होती है । इन नौ कोटियों में से कुछ कोटियों के द्वारा व्रत को दूषित करना प्रतिवार कहलाता है और सभी कोटियों से व्रत को भंग कर देना अनाचार कहलाता है ।
इस प्रकार भङ्गभङ्ग की अपेक्षा अर्थात् किसी अपेक्षा से वृत का भङ्ग होना और किसी अपेक्षा से वृत्त का भङ्ग नहीं होना यतिचार का रूप हैं। छेदन बन्धन यादि दोषों के बावजूद भी प्राणरक्षा का भाव रहता है, इसलिये वृत का भङ्ग है, यहां छेदन, बन्धन यादि दोषों का व्याख्यान करते समय 'दुर्भाना' शब्द की योजना ऊपर से कर लेना चाहिये अन्यवा लकड़ी से नाक का छिदांना दूति श्रङ्गोपाङ्गों का. काटना रोग को दूर करने के लिए श्रहारादि का रोकना भी अतिचार में संमिलित हो जावेगी | उमास्वामी महाराज ने भी अहिंसा वृत के ये ही पांच प्रतिचार वतलाये हैं । बन्धवत्रच्छेदातिभारारोपरान्नपाननिरोधः, अर्थात् बन्ध, वध, ( पीडा ), छेद | प्रश्न है कि प्र व्रत का धारक मनुष्य घर में गाय, भैंस प्रति पशुओं के रखने पर उन्हें बाँधता है या नहीं ? यदि वांचता है तो बन्धनाम का अतिचार होता है, तो में उत्पात करते हैं । इस प्रकार विषय में आचार्यों ने उत्तम, मध्यम, और जघन्य .का विभाग करते हुए तीन व्यवस्थाएं की हैं उत्तम तो यह है कि न्ती मनुष्य, गाय,
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