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अध्याय : मव
[ १०६ हिसा होती है, उसे प्रारम्भी हिंसा कहते हैं । खेती तथा अन्य उद्योगों से होने वाली हिंसा भी उद्यमी हिंसा है। और शत्रु से अपना बचाव करने के लिए जो हिंसा होती है, उसे विरोधिहिंसा कहते हैं । इन चार प्रकार की हिंसानों में से अहिंसारण - . वती जीवमाण संकल्पी हिंसा का त्याग कर पाता है। शेष तीन हिसाओं का नहीं और वह भी. मात्र त्रसजोवों की हिंसा का। सामान्य रूप से हिंसादि पापों का त्यागः मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना के भेद से नी प्रकार का होता है। परन्तु यह गृहविरत गृहस्थ के ही संभव हो सकता है। गृहनिरत गृहस्थ के नहीं । गृहनिरत-घर में रहने वाला गृहस्थ यथाशक्ति तीन, छह अथवा नौ कोटियों से हिंसादि पापों का त्याग करता है। प्राचार्य उमास्वामी महाराज ने हिंसा का लक्षण लिखा है--
प्रमत्तयोगात् प्रारराव्यपरोणं हिप्ता । .. अर्थात् प्रमत्त योग से प्रारणों का व्यपरोपण-विधात करना हिसा है। यहां (प्रभत्तयोग) इस हेतु में ही मन, वचन, काय तथा कृत, कारित, · अनुमोदना इन नौ कोटियों का समावेश किया गया है।
प्रश्न :-अहिंसाणुनत की भावनायें कितनी हैं और उनका क्या स्वरूप
उत्तर :----अहिंसारण व्रत की पांच भावनायें हैं । वाग्गुप्ति, मनोगुप्ति, ईर्या समिति, प्रादान निक्षेपण समिति और पालोकित पान भोजन ये भावनायें व्रतों की स्थिरता के लिये हैं, और इसी प्रकार प्रत्येक वृत्तों की पांच-पांच भावनायें हैं । भावना किसी वस्तु का बार-बार चिन्तवन करने को कहते हैं। .. बाङमनो गुप्तीर्यादाननिक्षेपण समत्यिालोकित पान भोजनानि पंच ॥३६।।
मोक्षशास्त्र०अ०७सुत्र नं. ४ वाग्गुप्ति :-बचन की प्रवृत्ति को रोकना । .... मनोगुप्ति :-मन की प्रवृत्ति को रोकना ... . इर्या समिति ---बलते समय चार हाथ प्रमाण जमीन देख कर चलना,
आदाननिक्षेपरग समिति—किसी भी वस्तु को रखते व उठाते समय जीव रक्षा का ध्यान रखते हुए पदार्थ को रखना उठाना ।
-rnharanwweindi--
Hasive:
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-----.hikarius