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________________ १०८ | [ गो. प्र. चिन्तामणि इन्द्रियां, तीन बल, ग्रायु और श्वासोच्छवास ये दश द्रव्य प्राण कहलाते हैं। और ज्ञान, दर्शनादि गुण, भावप्राण कहलाते हैं । इन प्राणों के प्रतिपात- बात करने को प्राणातिपात कहते हैं, इसका प्रचलित नाम हिंसा है । जो वस्तु जैसी नहीं है, उसे उस प्रकार कहना वितथव्याहार-असत्य भाषण है । इसके सदपलायु, असदुद्भावन, अन्य रूपाभिधान तथा गहितादि वचन के भेद से चार भेद हैं। प्रदत वस्तु का ग्रहणास्तेय है । स्मरणंकीर्तन केलिः प्रोक्षणं गुह्यभाषणम् । सकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिवृति रेव च ॥३६॥ एतन्मैथुनमष्टाङ्गः प्रवदन्ति मनीषिणः । विपरीतं ब्रह्मचर्यमेतदेवाष्ट लक्षणम् ॥१३७॥ अर्थ :-- स्मरण, कीर्तन, क्रीडा ( हास परिहास), प्रेक्षण, गुह्य भाषण, संकल्प श्रध्यवसाय और क्रियानिवृति (मैथुन में प्रवृत्ति ) इन आठ प्रकार के मैथुनों में प्रवृत्ति होना काम या कुशील कहलाता है। तथा धन्य धान्यादि पदार्थों में ममता: भाव रूप परिणाम होना मूर्च्छा । इसे ही परिग्रह कहते हैं । लोक में ये पांचों कार्य पाप कहे जाते हैं, इनकी स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार की परिस्पति होती हैं। ग्राम जनता में जो पाप स्वीकृत किया गया है, और जिसके करने पर राजकीय तथा सामाजिक दण्ड प्राप्त होता है, उन्हें स्थूल पाप कहते हैं । एसे स्थूलपापों से निवृत्ति होना अणुव्रत कहलाता हैं । गृहस्थ उक्त पापों का त्याग कर सकता है । प्रश्न :- हिंसा का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- -जो तीनों योगों के कृत, कारित, अनुमोदना संकल्क से त्रस जीवों को नहीं मारता उसे हिंसादि पापों के त्यागरूप व्रत के विचार करने में समर्थ मनुष्य स्थूल हिंसा का त्याग अर्थात् ग्रहिसा मरण व्रत कहलाता है । सङ्कल्पात्कृत कारित मननाद्योग त्रयस्य चर सत्वान् । नाहिनस्ति यत्तवाहु: स्थूलवधाद्विरमरणं निपुखाः ||३८|| संकल्पी, प्रारम्भी, उद्यमी और विरोधी के भेद हिंसा चार की मानी गई विचार से बलिदान आदि के समय जो गृहस्थी सम्वन्धी अन्य कार्य करने में जो है । मैं इस जीव को मारू, इस प्रकार के हिंसा होती है, उसे संकल्पी हिंसा कहते हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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