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प्राध्याय : पांचवां ] .
[ १०७ धारक होता है और पंच परमेष्ठियों की अखण्ड श्रद्धा रखता है, तब यह दर्शनिक श्रावक कहलाता है । यहां से पञ्चम गुणस्थान का प्रारम्भ होता है। यह नैष्ठिक श्रावक का पहला. भेद है।
प्रश्न :--वृतप्रतिमा का क्या स्वरूप हैं ?
उत्तर :---जो गल्य रहित होता हुवा अतिचार रहित पांचों अणुवतों को और सातों शोलों को धारण करता है, वह अतियों के मध्य में प्रतिक श्रावक व्रतप्रतिमा धारी माना गया है।
निरतिक्रममावत पञ्चकमपि शील सप्तकं चापि । धारयते निःशल्यो योऽसौ व्रतीनां मतो नातकः ॥३४॥
पहली प्रतिमा में तीन शल्यों का प्रभाव नहीं हवा था तथा अणुव्रतों में कदाचित अतिवार लगते थे, परन्तु दूसरी प्रतिमा में पाते ही इसकी तीनों शल्य छुट जाती है, और पांच अणुनतों का निरतिचार पालन होने लगता है। तीन गुणन्नतों और चार शिक्षागतों का भी यह पालन करता है, परन्तु इनके पालन में कदाचित् अतिचार लगते हैं । यह अतिक श्रावक कहलाने लगता है।
प्रश्न :-शल्य कितनी और उनका क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-शल्य तीन प्रकार की है मायाशल्य, मिथ्याशल्य पीर निदानशल्य । जो प्रात्मा को कांटे की तरह दुःख देती है, उसे शल्य कहते हैं ।
___मायाशल्य-छल, कपट करना । मिथ्याशल्य-तत्व श्रद्धा का अभाव । का निदान शल्य-आगामी काल में विषयों की ब्रांछा करना, ये तीनों प्रकार की शल्ये प्रती श्रावक को नहीं होती और अगर तीनों में से एक भी होगी तो अतप्रतिमाधारी नहीं है
प्रश्न :-प्रणवत किस को कहते हैं और उसके कितने भेद हैं ?
उत्तर :-हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और मूर्छा. (परिरह) इन स्थुल पापों से विरत होना अणुवत है। . .. .. .
प्राणातिपातवितथ व्याहारस्तेयकाममूर्छाभ्यः । स्थुलेभ्यः पापेभ्यो व्युपरमरणमणुव्रतं भवति ॥३५॥
जिनके संयोग से जीव जीवित और वियोग में मृत कहलाता है, उन्हें प्राण । कहते हैं, इनके द्रव्य प्राण और भाव प्रारण की अपेक्षा दो भेद हैं । स्पर्शनादि पांच
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