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[ गो. प्र. चिन्तामरिण :
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रग वत और परिग्रह परमाणाणुव्रत इस प्रकार पांच ये और इन अणुव्रतों की रक्षा के . लिये तीन गुणवत और चार शिक्षाबन के भेद से सात शील वृत होते हैं। इस तहर सब मिलाकर विकल चारित्र के बारह भेद हैं ।
___ वैसे तो प्राचार्यों ने विकल' चारित्र को क्यारह प्रतिमा रूप में विभक्त किया है ।
प्रश्न :-ग्यारह प्रतिमानों के क्या नाम है ?
उत्तर :-दर्शन प्रतिमा, व्रतप्रतिमा, सामायिकप्रतिमा, प्रोषधप्रतिमा, सचित त्यागप्रतिमा, रात्रिभुक्तित्यागप्रतिमा, ब्रह्मचर्यप्रतिमा, प्रारम्भत्यागप्रतिमा, परिग्रह त्यागप्रतिमा, अनुमति त्यागप्रतिमा और उद्दिष्ट त्यागप्रतिमा-ये ग्यारह प्रतिमानों के नाम हैं।
दंसरण वय सामाइय, पोसह सचित्त राय भत्तेय । बंभारंभ परिग्ग अण्ण मणमुद्दिष्ट देश घिरदोय ॥१॥
चारित्र पाहुड॥३२॥ प्रश्न :-दर्शनप्रतिमा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर ---जो सम्यग्दर्शन से शुद्ध है और संसार, शरीर और भोगों से विरक्त । है, पञ्च परमेष्ठियों के चरणों की शरण जिसे प्राप्त हुई है तथा पाठ मूलगुणों को जो । धारणा कर रहा है, वह दर्शनिक श्रावक है।
सम्यग्दर्शन शुद्धः संसार शरीर भोगनिविष्णः । पञ्चगुरु चरणशरगो दनिकस्तत्व पथगृह्यः ।।१६॥३३॥
रत्नकरंड श्रावका०.५॥ जो निरतिचार सम्यग्दर्शन को पालता है, परन्तु ब्रतों से सर्वथा रहित है। वह अविरत सम्यग्दृष्टि कहलाता है। यही जीव जब अष्ट मूलगुरणों को अतिचार रहित धारण करता है तथा सप्न व्यसनों का सातिचार त्याग करता है, लब पाक्षिक श्रावक कहलाता है 1 असयंत सम्यन्दृष्टि तथा पाक्षिक श्रावक ये दोनों ही चतुर्थगुगा । स्थानवर्ती हैं। इसके प्राग जब यह सम्बग्दष्टि संसार, शरीर और भोगों से विरक्त । होकर व्रत धारण करने के क्षेत्र में अग्रसर होता है ।
तथा मद्य, मांस और मधु के त्याग के साथ हिसाणवत प्रादि पांच अणुव्रतों का